सितंबर 29, 2010

घर की बातें!!

पिछले कुछ समय से मुझे 'बच्चों की परवरिश कैसे की जाए' इस विषय पर किताबें उपहार में मिलने लगी हैं, कुछ लोग किसी वेबसाइट का पता बताते हैं तो कोई कुछ और। सोशल नेटवर्किंग साइट पर भी यह मुद्दा खासा चर्चा में रहता है। खासतौर पर लड़कियों को कैसे पाला जाए कि वह बिगड़े नहीं, इस बारे में मेरी पिछले दिनों कई मांओं के साथ बातचीत हुई और अधिकांश मामलों में बच्चों को ले कर मां-बाप काफी हद तक परेशान थे। इन सब के बीच मैं यह सोच रही हूं कि जब हम भाई-बहन बड़े हो रहे थे तो अम्मा-पापा की भी तो इन्ही परेशानियों से दो-चार होना पड़ा होगा। और मुझे याद आए दो-चार ऐसे वाकये जो मेरी सीधी-साधी, कम पढ़ी-लिखी लेकिन बहुत ही व्यवहार-कुशल मां और रोबदार से दिखते लेकिन बहुत नरमदिल मेरे पापा की ज़बरदस्त 'parenting skills" को दिखाते हैं।

मुझे हमेशा यह सोच कर हैरत होती है कि आजकल तमाम सुख-सुविधाओं के बीच एक या दो बच्चों को पालने में दिक्कत होती है तब अम्मा के लिए हम पांचों को पाल पाना कितना मुश्किल रहा होगा। जब रसोई में गैस जैसी साधारण सुविधा भी नहीं थी।
बहरहाल, बात हो रही थी उनकी ‘parenting skills’ की तो सबसे पहली बात मुझे जो याद आ रही है वो मेरी किताबें पढ़ने की आदत की है। हां, पढ़ने का चस्का लगाने के पीछे भी मेरे पापा का ही हाथ था। हम तब देहरादून में रहते थे और मैं मुश्किल से पहली या दूसरी कक्षा में पढ़ती थी। तभी से पापा मेरे लिए नंदन, चंपक और चंदामामा किताबें लाते थे। पापा की तनखा मामूली सी थी हालांकि वह बहुत कमाऊ विभाग में थे लेकिन उनके बहुत ही धर्मभीरू किस्म के होने के चलते हमारी आर्थिक दशा में उससे कभी कोई फर्क नहीं पड़ा। सो बंधी-बंधाई तनखा, किराए का मकान, घर में लगे रहने वाली रिश्तेदारों की भीड़ के बावजूद किताबों के लिए खर्च करने में उन्होंने कभी कोई कोताही नहीं की। साथ ही धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान भी लगा हुआ था। नया-नया पढ़ना सीखने के कारण मेरे हाथ जो लगता था उसे ही पढ़ने की कोशिश करती थी। फिर एक दिन एक रिश्तेदार के घर रखी किताबें टटोलते हुए सबसे पहले एक घटिया चलताऊ किस्म का उपन्यास पढ़ा और फिर जैसे उस तरह की किताबें पढ़ने का चस्का लग गया। तब मैं केवल तीसरी या चौथी कक्षा में थी।

तब उपन्यास पढ़ना गंदी बात समझी जाती थी ज़ाहिरी तौर पर जिस तरह के उपन्यास मैं पढ़ने लगी थी वह घटिया थे, विशेषकर उस उम्र के लिए। यह बात मुझे भी पता थी इसलिए ये उपन्यास सबसे छुप कर पढ़े जाते थे। एक दिन अम्मा ने पाया कि मैं जून की झुलसती गर्मीं में छत की सीढ़ियों में छिप कर उपन्यास पढ़ रही हूं। अम्मा ने किताब की बाबत एक शब्द भी नहीं कहा जबकि यूं रंगे-हाथों पकड़े जाने से मेरी जान सूख गई थी। उसी शाम पापा ने मुझे बुला कर पूछा कि मैं क्या पढ़ रही हूं और कहां से लाई वगैरह-वगैरह। आमतौर पर डांट-डपट करने वाले पापा ने यह सब बहुत शांति से पूछा था और कहा कि ये किताबें तुम्हारे लायक नहीं है, इन्हें मत पढ़ा करो। कुछ दिनों बाद ही पापा मेरे लिए एक उपन्यास लाए शिवानी की लिखी भैरवी मुझे वह पढ़ कर बहुत मज़ा आया क्योंकि पता नहीं क्यों बच्चों की कहानियां मुझे बहुत बचकानी लगती थीं, जब मैं बच्ची थी तब भी। इसलिए मेरे लिए यह किताब चुनना पापा की समझदारी ही दिखाता है। उसके बाद नियमित अंतराल के बाद मुझे साहित्यिक उपन्यास, रादुका से प्रकाशित रूसी साहित्य की किताबें मिलती रहीं और बाज़ारू किस्म के उपन्यासों से मेरा मन कब उचाट हुआ मुझे पता ही नहीं चला।


अभी मैं इस पूरी स्थिति का आंकलन करती हूं तो मैं आश्चर्य करती हूं कि कितनी सहजता से मुझे अहसास कराए बिना मेरी पढ़ने की आदत को एक सही दिशा दिखा थी। वो भी तब जबकि साहित्य वगैरह के बारे में उनका रुझान ज़्यादा नहीं था। जितना मैं खुद को जानती हूं मुझे पूरा यकींन है कि अगर तब मुझे डांट कर मना किया जाता तो मैं और भी घटिया किताबों को पढ़ने के लिए चुन कर उनके खिलाफ अपना विद्रोह ज़ाहिर कर सकती थी।


हम तीन बहनें थी, एक खास उम्र के बाद यह बात मोहल्ले वालों की नज़रों को और चौकस बना देती है और गली-मोहल्ले के शोहदों को और सक्रिय। हम लोग छोटे शहरों की अच्छी लड़कियों के लिए निर्धारित सभी नियमों का पूरी तरह से पालन करती थीं। हमेशा सिर झुका कर चलना, शोहदों के फिकरों को सुन कर भी अनसुनी कर निकल जाना और कुछ भी हो जाए सार्वजनिक जगहों पर लड़कों से बातें न करना। ऐसा किसी ने हमें कहा नहीं था लेकिन पता नहीं कैसे ये कायदे-कानून हर बड़ी हो रही लड़की को पता होते थे, क्योंकि बिगड़ी लड़की का तमगा मिलना बहुत ही आसान होता था जिससे सब डरती थीं। मैं इतना ज़्यादा डरी रहती थी कि कभी किसी से बात करनी पड़ जाए तो मैं डर से हकलाने लगती थी और चेहरे की सारी नसें तन जाती थी। यह एक तरह का फोबिया था। ऐसे हालातों में घर के अंदर रहना ही सबसे अच्छा विकल्प होता था, असर यह हुआ कि मैं तो पूरी तरह घरघुस्सु हो गई थी। मुहल्ले में एक-दो सहेलियों को छोड़ कर और किसी के घर जाने की कभी हिम्मत ही नहीं होती थी।
हमारे पड़ोस में एक परिवार रहता था जिसमें मुझसे कुछ बड़ी उम्र के तीन भाई थे ज़ाहिरी तौर पर इसलिए उस घर में जाने का तो सवाल ही नहीं था। एक बार दीवाली में उनके किसी करीबी रिश्तेदार की मौत होने के चलते त्यौहार नहीं मनाया जा रहा था। चूंकि उन दिनों मोहल्ले के रिश्ते काफी करीबी हुआ करते थे तो अम्मा ने उनके लिए भी गुझिया बना डाली ताकि बेचारे बच्चे तो त्यौहार के दिन मिठाई से वंचित न रहें। गुझिया पहुंचाने की जिम्मेदारी मुझे दी गई, क्योंकि अंम्मा और पापा ही लड़कों को ले कर मेरे अंदर बैठे इस डर से पूरी तरह से नावाकिफ थे तो उन्हें बहुत गुस्सा आया जब मैंने कहा कि मैं नहीं जाउंगी वहां। पापा ने कहा कि ये तो तुम्हें ही दे कर आने होंगे। अब एक तरफ वो फोबिया था दूसरी तरफ पापा से डांट खाने का डर। मैं किसी तरह घसीटते हुए बिल्कुल अपने घर से जुड़े उनके घर के गेट तक तो पहुंच गई लेकिन उन्हें आवाज़ देने या गेट खटखटाने की हिम्मत ही नहीं हुई। हाथ-पैर जैसे जम से गए थे, मैं वापस आ गई और रोने लगी। पापा ने पूछा क्या बात है? मैंने कहा कि मुझे वहां जाने में डर लग रहा है। और पता नहीं पापा क्या और कैसे समझे उन्होंने मुझसे कहा कि, “बेटा ऐसे डर के ज़िंदगी थोड़ी चलेगी। जा कर दे कर आओ।"


हालांकि उन्होंने इसके अलावा कुछ भी नहीं कहा लेकिन पता नहीं मुझे इतनी हिम्मत कैसे आई। मैं सीधे गई, गेट पर आंटी को आवाज़ लगाई जिसे सुन कर उनका बेटा बाहर आया और मैंने उसे मिठाई पकड़ा दी। वो लड़का स्कूल में मुझसे एक क्लास आगे था। उन्हीं दिनों तिमाही या छमाहीं परीक्षा के परिणाम निकले थे। वो लड़का अपनी क्लास में और मैं अपनी क्लास में प्रथम आए थे। जब मैंने उसे मिठाई दी तो उसने बहुत ही सहजता से पूछा, "तेरे गणित में कितने नंबर हैं?" मैंने बिना हकलाए या झेंपे उसे अपने नंबर बताए और फिर हमने थोड़ी देर ऐसी ही कुछ और बातें की और मैं वापस आ गई। "चमत्कार!! इतना आसान था इस फोबिया से बाहर निकलना…!!"


मैं सोच कर हैरान रह जाती हूं कि पापा ने कभी पेरेंटिंग पर या वैसे भी कोई बहुत ज़्यादा किताबें नहीं पढ़ी उसके बावजूद वो कितनी अच्छी तरह समझ गए मेरी परेशानी और उसका उपाय। आज मैं सबसे बहुत खुल कर बातचीत कर लेती हूं, अपरिचितों के साथ आसानी से दोस्ती कर लेती हूं तो इसका श्रेय निसंदेह मेरे पापा की parenting skills को जाता है।


हमारे कस्बे में नए-नए खुले डिग्री कॉलेज में क्योंकि विज्ञान की कक्षाएं नहीं थीं इसलिए बारहवीं के बाद पढ़ने के लिए नैनीताल गई। मेरे कुछ रिश्तेदारों ने इस फैसले का बहुत विरोध किया कि पांच बच्चों का खर्च उठाना है, वैसे भी दो-चार साल बाद लड़की को शादी करके विदा करो...हॉस्टल में डाल कर क्यों पैसे खर्च करते हो। पापा आर्थिक से ज़्यादा इस बात को सोच कर मेरे नैनीताल जाने के पक्ष में नहीं थे कि वो मेरे बिना कैसे रहेंगे। लेकिन इस बार झंडा मेरी मां ने उठा लिया था कि मेरी लड़की पढ़ने के लिए नैनीताल ही जाएगी किसी रिश्तेदार के घर पर रह कर नहीं पढ़ेगी। दरअसल मेरी मां को उनके सख्तमिजाज़ दादा जी की वजह से ही बहुत जल्दी ही स्कूल छोड़ कर घर के कामकाज में लग जाना पड़ा था इसलिए पढ़ने की साध वह अपनी लड़कियों के जरिए पूरा करना चाहती थी।

इस तरह आगे की पढ़ाई के लिए पांच साल नैनीताल रहना हुआ जहां बहुत सारे दोस्त बने, खासतौर पर युगमंच के साथ सक्रियता के दिनों में। छुट्टियों में दोस्तों की चिट्ठियां आती थी जिसमें कभी-कभार किसी लड़के की भी होती थी। जिनके बारे में बिना किसी हिचक के अम्मा-पापा को बताती थी। स्कूल के दिनों में जहां मेरी क्लास की दूसरी लड़कियों को स्काउट-गाइड के कैंप वगैरह में जाने के लिए घर में मिन्नतें करनी पड़ती थीं। हमारे घर में इसके लिए कभी रोक-टोक नहीं हुई, बल्कि हर कैंप में जाने, वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। हमारे घर में दोस्तों का निस्संकोच आना-जाना होता था जिसके बारे में मेरे घर वालों को कोई परेशानी नहीं होती थी लेकिन कुछ पड़ोसियों के माथे पर बल पड़ते थे। शायद एक दिन अम्मा ने कहीं कुछ सुन लिया तो वह कुछ परेशान थी और उन्होंने इस बाबत कुछ चिंता ज़ाहिर की थी लेकिन पापा ने एक टूक कहा कि, “मैं चाहता हूं कि मेरे बच्चे बिना किसी कुंठा के रहें, अगर किसी को इससे किसी को दिक्कत है तो हम क्या कर सकते हैं। " मैं उनकी बात अब तक नहीं भूली।


मैं जानती हूं कि मेरे पापा विचारों के मामले में बहुत आधुनिक नहीं हैं लेकिन उस समय उनकी यह बात सुन कर मुझे गर्व हुआ और मैंने हमेशा कोशिश की कि मेरे किसी भी काम से पापा के इस विश्वास को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए। जब मैंने एक अलग धर्म के लड़के से शादी करने का फैसला किया तब भी पापा को मेरे चुनाव पर तो भरोसा था लेकिन शुरुआत में उनकी बहुत ही हल्की सी आनाकानी के पीछे वजह वजह थी कि उन्हें यही नहीं पता था कि लड़का कुछ कमाता-धमाता भी है या नहीं। एक पिता के तौर पर उनकी चिंता बहुत स्वाभाविक थी लेकिन एक बहुत ही संकीर्ण विचारधारा वाले और बहुत कम दुनिया देखे हमारे संयुक्त परिवार के दबाव के बावजूद अम्मा-पापा ने जिस सहजता से मेरे फैसले का समर्थन किया वह अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम था उनके स्तर पर। इसके लिए मैं हमेशा उनकी आभारी रहूंगी।


एक किस्सा और याद आ रहा है वह दिल्ली के दिनों का है। नैनीताल में युगमंच के दौरान दोस्तों के साथ बेबाक हंसी-मज़ाक की आदत पड़ी होने के चलते मैं हर किसी के साथ बहुत सहजता से बात कर लेती थी। लेकिन हिंदी अखबारों का माहौल थियेटर से बहुत अलग होता है, यह बात मुझे तब समझ आई जब कई सारे दोस्तों ने मेरी हंसी-मज़ाक के कुछ और ही मतलब निकालने शुरू कर दिये। खैर, एक महाशय थे जिन्हें मैं बहुत ही परिपक्व और बहुत खुले दिमाग वाला दोस्त समझती थी। तो एक छुट्टी में मैं जब अपने घर आई थी तो उन महाशय ने कहीं से मेरे घर का फोन नंबर पता कर लिया और एक दिन उनका फोन आ गया। मुझे इस बात पर इतना गुस्सा आया कि उधर से कही जा रही बात सुने बिना मैंने जो जी में आया डांटने के बाद फोन रख दिया। यह सब अम्मा-पापा के सामने हुआ। दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला। अगले दिन अम्मा ने कहा, "तूने उसकी बात तो सुनी ही नहीं, बिना सुने इस तरह किसी को इस तरह उल्टा-सीधा बोलना अच्छी बात नहीं है।" मैंने कहा, “तुझे कुछ पता नहीं अम्मा, लोग कैसे-कैसे होते हैं।" अम्मा ने कहा, "हो सकता है कि तू उसे मुझसे अच्छी तरह जानती है, लेकिन अगर उसकी बात सुन लेती तो शायद तू उसे और अच्छी तरह से जान जाती चाहे उसकी बुराई ही सही! कभी भी किसी का अपमान नहीं करना चाहिए, ऐसे में तो कोई भी तेरा दुश्मन बन जाएगा। तुझे उससे बात नहीं करनी थी उसे सीधे शब्दों में कहती तो वह समझ भी जाता और उसे बुरा भी नहीं लगता। किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिए!"

सच कहूं तो मैं हतप्रभ रह गई थी अम्मा की वह बात सुन कर। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरी कम पढ़ी-लिखी मां दुनियादारी के साथ मानव मन की बातों को इतनी अच्छी तरह से समझती है। सामान्य तौर पर उसे खुश होना चाहिए कि मैंने किसी लड़के को उसकी "गलत हरकत" के लिए इस तरह से डांटा, लेकिन उसने मेरी खामी को देखा और समझाया। बाद में इस तरह की परिस्थितियों से निपटने के लिए मैं अम्मा का सुझाया रास्ता ही अपनाती थी, जिसका परिणाम यह हुआ कि इस तरह की पहल करने वाले कुछ दोस्तों के साथ बिना कोई कड़वाहट के बाद में भी अच्छी बोलचाल वाले रिश्ते बने रहे। क्या कहूं इसे? कुछ और या अम्मा की parenting skills!! :-)

ऐसा नहीं है कि अम्मा-पापा बिल्कुल आदर्श अभिभावक थे। हो सकता है कि उनकी जिन बातों से मुझे नई समझ मिली, उन्हें बिना उसके मनोवैज्ञानिक परिणामों के बारे में जाने बिना बस अपनी सहज बुद्धि के आधार पर कहा गया हो। कई बातों को ले कर मेरी उनसे लड़ाइयां होती थी। पापा से अब तक होती हैं, लेकिन बहुत सारे मामलों में वो अपने समय से आगे के साबित हुए हैं खास कर हमारी जैसी सामाजिक-पारिवारिक परिस्थितियों में और उसके लिए मुझे उन पर बहुत गर्व है। हम सभी भाई-बहनों ने बहुत ही सहज, खुशनुमा बचपन बिताया और सब आत्मनिर्भर और अपनी स्वतंत्र सोच वाले हैं तो इसके पीछे अम्मा-पापा की कर्मठ और जिम्मेदार अभिभावक की भूमिका का भी हाथ है। हम सब भाई-बहनों के पास ऐसे ही कोई न कोई किस्से हैं जिन्हें अब, जब हम खुद मां-बाप बन चुके हैं, बहुत शिद्दत से याद करते हैं।

सितंबर 26, 2010

राग और जोश

अभी-अभी एक बहुत ही दिलचस्प किताब पढ़ कर खत्म की है। शीला धर की लिखी इस किताब का नाम है 'raga'n josh'। पढ़ने में इतना मज़ा आया कि बस मन किया इसे अपनी ऑनलाइन डायरी यानी इस ब्लॉग में दर्ज़ कर लिया जाए। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की जानी-मानी गायिका शीला धर ने अपनी इस प्यारी सी किताब में संगीत की बड़ी-बड़ी शख्सियतों से इतनी आत्मीयता से अपने पाठकों से मिलवाया है कि लगता है आप उनसे सचमुच मिल चुके हैं। शीला जी एक गायिका होने के साथ-साथ एक उच्च पदासीन अधिकारी की पत्नी भी थी और खुद कई सालों तक प्रकाशन विभाग में संपादक की सरकारी नौकरी में रहीं। वह दिल्ली के पुराने संभ्रांत माथुर परिवार में पैदा हुई थीं, एक खानदानी कायस्थ परिवार की परंपराओं की रोचक बानगियां भी इस किताब में है।


'raga'n josh' पढ़ते हुए लगता है कि जैसे घर भर के लोग किसी सर्द रात में गर्म रज़ाइयों में घुस कर किसी हंसोड़ मौसी या बुआ से पुराने किस्से सुन रहे हों। शीला धर का हास्यबोध इतने गज़ब का है कि कई बार आप हंस-हंस कर लोटपोट हो जाते हैं। कम से कम मुझे तो याद नहीं कि पिछली बार किस किताब को पढ़ कर मैं इतना हंसी होऊंगी। इससे यह मत मान लीजिएगा कि यह कोई हल्की-फुल्की मज़ाकिया किताब है, ऐसा बिल्कुल नहीं है। दरअसल यह किताब दो हिस्सों में हैं। पहला "Here's is someone I'd like you to meet" में उन्होंने दिल्ली के नंबर सेवन सिविल लांइस पते वाले घर में बीते अपने बचपन की बातों को याद करने के साथ-साथ संगीत की दुनिया के दिग्गजों के बारे में इतनी दिलचस्प बातें बताईं हैं जो कोई उन्हें बहुत करीब से जानने वाला ही बता सकता है। उन बातों को जानने में ऐसा ही रस मिलता है जो अक्सर घरों में एक-दूसरे के बारे में होने वाली गुप-चुप खुसफुसाहटों में मिलता है।



शीला जी की बातों की इस महफिल में कोई छोटे-मोटे लोग नहीं बल्कि खुद बड़े गुलाम अली खान, बुंदु खान, प्राण नाथ, बेगम अख्तर, सिद्देश्वरी, केसर बाई केरकर , भीमसेन जोशी और उनके उस्ताद फैयाज़ अहमद खान जैसे लोग शामिल हैं। शास्त्रीय संगीत का ककहरा भी जानने वाले लोग इन नामों का वज़न जानते हैं लेकिन शीला जी की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि उनकी बातों में ये सारे लोग अपने ईश्वरीय बढ़प्पन के साथ नहीं बल्कि पूरी मानवीय विशेषताओं के साथ आते हैं जो कभी उन्हें बहुत खास तो कहीं बिल्कुल आम लोगों जैसा बनाती हैं। जहां उनकी कमियां सामने आती हैं तो वो भी उन्हें किसी तरह से कमतर नहीं बल्कि और भी मानवीय बनाती हैं। इस जटिल सी बात को शीला जी इतनी प्यारी तरह से लिखती हैं कि पाठक को दाद देनी ही पड़ती है।


बचपन के अपने पारिवारिक जीवन के बारे में बताते हुए वह न केवल अपनी मां के दुखद दांपत्य जीवन का जिक्र करती हैं बल्कि एक तरीके से भारतीय घरों में औरतों की बंधनपूर्ण जीवन का खाका भी खींचती हैं। उनके जीवन में एक पिता हैं जो अपनी पत्नी को मामूली नैन-नक्श होने के चलते न केवल नापसंद करते हैं बल्कि कुछ हद तक क्रूरता भरा व्यवहार भी करते हैं और यह बात उनके तीनों बच्चे समझते हैं और दुखी होते हैं। पिता की बेरुखी की वजह से खाते-पीते संयुक्त परिवार में मां और बच्चों के साथ होने वाले उपेक्षा भरे व्यवहार को शीला जी समझती है और उसकी सामाजिक मनोवैज्ञानिक स्तर पर व्याख्या भी करती हैं। लेकिन इन्ही पिता का एक और रूप भी है जो संगीत की दुनिया में शीला जी के आगे बढ़ने की वजह भी बनता है। उनके पिता संगीत के न केवल अच्छे जानकार थे बल्कि उन्होंने अपनी युवावस्था में प्रसिद्ध विष्नु दिगंबर पलुस्कर जी से संगीत सीखा भी था। वह उन दिनों होने वाले प्रमुख संगीत उत्सवों के आयोजनों में पूरी सक्रियता से हर तरह का सहयोग देते थे। दिल्ली के कई संगीत और डांस संस्थाओं के लिए वह एक मजबूत स्तंम्भ थे। उन्होंने अपना घर संगीतज्ञों के लिए खुला छोड़ा था जिससे उस दौर के लगभग सभी बड़े कलाकार उनके यहां आ कर कई-कई दिन तक रहते थे। उन्हीं दिग्गजों की संगत में ही शीला जी ने शास्त्रीय संगीत का हाथ पकड़ा और आगे चल कर संगीत की दुनिया में अपना नाम किया।

बहरहाल अपनी इस किताब में वह बताती हैं बुंदु खान साहब के बारे में जो उनकी बचपन की यादों का अभिन्न हिस्सा रहे। उनकी जादुई सारंगी से उनके परिवार का हर उत्सव, हर त्यौहार रौनक रहता था। शीला जी याद करती है उनके भोले-निश्चल से व्यक्तित्व को जो अपनी महानता से पूरी तरह अनभिज्ञ था। एक दिन उनके परिवार ने देखा कि वह फूलों की क्यारी में लेट कर आंखे बंद कर पूरी तन्मयता से सारंगी बजा रहे हैं। पूछने पर वह भोलेपन से जवाब देते हैं कि बसंत का मौसम है इसलिए वह फूलों के लिए बजा रहे हैं।" देश के बंटवारे के बाद बुंदु खान पहले तो पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे लेकिन मजबूरन उन्हें जाना पड़ता है। उनकी भावपूर्ण विदाई का संस्मरण भी यहां है।


फिर बड़े गुलाम अली खान के बारे में लिखते हुए वह बताती हैं कि वह मांसाहारी खाने के कितने बड़े मुरीद थे, एक कार्यक्रम के लिए उनके दिल्ली आने पर उन्हें गलती से एक शाकाहारी घर में ठहरा दिया गया तो उन्होंने किस तरह खुद खाना बनाया और खाने के बाद तय कार्यक्रम से बहुत देर बाद आयोजन स्थल पर पहुंचे। शीला जी ने प्राण नाथ का बहुत आत्मीय विवरण दिया है वह कुछ समय तक उनके गुरु भी रहे थे। कैसे बहुत गरीबी के बाद वह अमेरिका पहुंचे और विदेश में अपना पूरा एक संगीत साम्राज्य उन्होंने तैयार किया यह सब इस किताब में हैं।



बेगम अख्तर और सिद्धेश्वरी दोनों ही उनकी करीबी थीं लेकिन आपस में व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता रखती थी। लेकिन इन दोनों का बहुत ही लाड़ भरा परिचय शीला जी इस किताब में कराती हैं। एक बहुत ही मज़ेदार किस्सा सिद्धेश्वरी देवी की विदेश यात्रा के बारे में है जो बनारस की खांटी देसी महिला थीं।



बेगम अख्तर के बारे में कई रसभरे किस्से इसमें हैं। उनके अख्तरी बाई वाले दिनों से जुड़े रंगीन किस्से का भी इसमें जिक्र है। अपने उस्ताज फैयाज खान की गायकी के बारे में बताने के अलावा वह पाठकों को यह भी बताती हैं कि उनको पतंगे कितनी पसंद थीं। कहीं केसर बाई केरकर का जालंधर के नजदीक हरबल्लभ संगीत महोत्सव का गुणगान और फिर कई सालों बाद खुद शीला जी का इस विशिष्ट संगीत महोत्सव में भाग लेने का अनुभव है। कहीं भीमसेन जोशी की मदहोशी की चर्चा है।



संगीत के अलावा क्योंकि वह एक कामकाजी महिला और एक नौकरशाह की पत्नी भी थी तो उस जिंदगी से जुड़ी कुछ बहुत मज़ेदार यादें भी इस हिस्से में हैं, जिसमें एक में प्रकाशन विभाग में उनके गांधीवादी बॉस मोहन राव की शख्सियत के अलावा सिर्फ फाइलों में होने वाले सरकारी कामकाज पर एक बहुत ही सटीक कटाक्ष है। एक जगह गांधी फिल्म बनाने के सिलसिले में भारत आए रिचर्ड एटनबरो की मोहन राव के घर दक्षिण भारतीय खाने की दावत में हुई बुरी हालत का जिक्र है जहां पाठकों के लिए हंसी रोक पाना मुश्किल है।

उनके पति के दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में नियुक्ति के दौरान विदेशी अर्थशास्त्रियों की पत्नियों का मनोरंजन करने का भार कभी-कभी शीला जी पर भी पड़ जाता था। ऐसे में भारतीय संगीत खासकर कर्नाटक संगीत के बारे में जानने की उत्सुक एक मिसेज हैंडरसन को शीला जी की संगत में क्या कुछ झेलना पड़ता है वह पढ़ कर ही समझ आता है।


शीला जी खुद स्वीकार करती हैं कि वह बहुत बढ़िया मिमिक्री कर लेती थी और अभिनय में उनकी बहुत दिलचस्पी थी। अब चूंकि उन्होंने कैरियर के लिए संगीत का रास्ता चुन लिया था तो अभिनय का अभ्यास वह वास्तविक परिस्थितियों में करती थीं। उनके पति श्रीमती इंदिरा गांधी के निजि सलाहकार थे तो इसलिए उन्हें अक्सर उनके साथ संभ्रांत प्रशासनिक अधिकारियों और सांसदों की पत्नियों के साथ सरकारी समारोहों में जाना होता था जहां का नितांत औपचारिक माहौल शीला जी को कतई रास नहीं आता था। उन निरस समारोहों को वह अपनी अभिनय कला से कम से कम अपने लिए तो बहुत सरस बना लेती थीं। कैसे? यह लंबा किस्सा है जानने के लिए किताब पढ़नी पढ़ेगी।



किताब के दूसरे हिस्से में शास्त्रीय संगीत के विषय में लिखे हुए उनके कुछ लेखों का संकलन है। लेकिन ये केवल तथ्य बताते निरस लेख कतई नहीं हैं बल्कि संगीत की बारिकियों को अपनी खूबसूरत भाषा में पिरो कर लिखी गई दिलचस्प बातें हैं। यहां रागों के रूप, उनकी बनावट, उनके मिजाज़ को ऐसे समझाया गया है जैसे किसी प्रियजन की बात हो रही हो। संगीत का मेरा ज्ञान बहुत ही सतही है उसके बावजूद मुझे ये लेख पढ़ने में बहुत मज़ा आया जो लोग संगीत जानते हैं उनके लिए यह किताब पढ़ना बहुत ही बढ़िया अनुभव होगा, इसका मुझे पूरा विश्वास है।


फिलहाल मैं इतनी प्रभावित कि बहुत कुछ और लिख सकती हूं लेकिन मुझे पता है कि मैं कितना भी लिखूं उसका अंशमात्र रस भी आप तक नहीं पहुंचा सकती। इसलिए संगीत की दुनिया में दिलचस्पी रखने वाले दोस्तों के लिए राय है कि यह किताब जरूर पढ़ें।

जुलाई 13, 2010

हम गरीब हैं लेकिन बहुत सारे!

बहुत साल पहले दिल्ली के अपने शुरुआती दिनों में एक हस्तशिल्प प्रदर्शनी में एक स्टॉल पर टंगा कुर्ता मुझे बहुत पसंद आया था। आमतौर पर खरीदारी से बेज़ारी के बावजूद वह कुर्ता मुझे इतना अच्छा लगा कि मैंने दाम भी पूछ लिए थे। बहरहाल तब कीमत बज़ट से बाहर लगी थी और मैंने वह नहीं खरीदा। लेकिन इतने सालों बाद मुझे यह बात अचानक याद आई और पता नहीं क्यों यह कचोट सी हुई मैंने वह कुर्ता क्यों नहीं खरीदा। दरअसल वह स्टॉल SEWA (Self Employed Women Association) का था। यह बात तो तब मुझे पता थी, लेकिन वह कुर्ता किन औरतों ने किन परिस्थितियों में किन उम्मीदों के साथ तैयार किया होगा इसका अंदाज़ा मुझे हाल ही इला आर. भट्ट की लिखी 'We are poor but so many' पढ़ कर हुआ। इस किताब को पढ़ना मेरे लिए एक अद्भुत अनुभव रहा।


गांधीवादी इला भट्ट ने अति गरीब वर्ग की कामकाजी महिलाओं को सेवा संस्था के रूप में न केवल एक मजबूत संठनात्मक रूप दिया बल्कि उन्हें बेहतर स्थितियों में सम्मानजनक जीवन जीने के अवसर प्रदान किए। किताब की प्रस्तावना में उन्होंने एक बहुत महत्वपूर्ण बात पर जोर दिया है वह यह कि आर्थिक सुधारों के केंद्र में अगर महिलाओं को रखा जाए तो बेहतरीन परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। उनका मूलमंत्र है कि महिलाएं मजबूत और महत्वपूर्ण संगठन खड़ा करने में सक्षम हैं। महिलाएं अपने अनुभवों की मदद से समस्याओं के व्यवहारिक हल निकाल सकती हैं और ऐसा करते हुए वे समाज और पर्यावरण को सकारात्मक रूप से बदलती हैं जो सम्मानजनक, अहिंसक और आत्मनिर्भर है।


महिलाओं की क्षमताओं पर अपने विश्वास को उन्होंने सच साबित करके भी दिखाया। आज देश भर में फैली सेवा से जुड़ी विभिन्न कार्यक्षेत्रों में सक्रिय सात लाख से अधिक महिलाएं न केवल अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रही हैं बल्कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से देश की अर्थव्यवस्था में भी अपना योगदान दे रही हैं। इला जी की यह किताब इन्हीं जीवट महिलाओं की कहानी है। यह वही महिलाएं हैं जिनके काम को सरकारी तंत्र पहले काम का दर्ज़ा देने तक से इनकार करता था। इला जी ने अपने प्रयासों से असंगठित रूप से विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले इन कामों को चिन्हित कर सबसे पहले विशेष रूप से महिला श्रम संगठन बनाया। यह कदम महिला अधिकारों के क्षेत्र में मील का पत्थर है।


अपनी इस किताब में इला जी ने बहुत प्रभावी तरीके से गरीब कामकाजी महिलाओं की आर्थिक सामाजिक परिस्थितियों का वर्णन किया है। सेवा संस्था की शुरुआत अप्रैल 1972 में शहरी क्षेत्र की अति गरीब कामकाजी महिलाओं के बीच हुई, लेकिन उसका कार्य क्षेत्र बाद में ग्रामीण इलाकों में भी फैल गया। आज यह संस्था गुजरात के अलावा बहुत से अन्य राज्यों में सक्रिय है और लाखों महिलाओं को जीने का हौसला और रास्ता दिखा रही है।


'We are poor but so many' पढ़ना कम से कम मेरे लिए एक आंख खोल देने वाला सा अनुभव रहा। इसमें कपड़ा मिलों से कूड़े के रूप में निकलने वाली चिंदियां बीनने, उन चिंदियों को सिल कर कपड़े तैयार करने, कबाड़ बीनने, रेहड़ी लगा कर सब्जी बेचने जैसे श्रमसाध्य काम करने वाली महिलाओं के संघर्षपूर्ण जीवन का चित्रण झकझोर देता है। पेट की आग बुझाने के लिए शहरों की ओर पलायन करने वाले दिहाड़ी मज़दूर परिवार, उनकी महिलाएं, बच्चे किन हालातों में रहते हैं, कैसे एक-एक दिन का जीवन जीने की लड़ाई लड़ते हैं या कच्छ के सूखेपन को कड़ाई के रंगीन धागों से सजाने वाली महिलाओं को घर से निकल कर अपनी कला को बाजार तक पहुंचाने की जद्दोजहद में परिवार के किन दबावों को झेलना पड़ा, उन सब का जीवंत खाका इस किताब में है। रन ऑफ कच्छ के वीरान तटीय इलाके में नमक बनाते परिवारों की आर्थिक जद्दोजहद बहुत साफ तरीके से समझा देती है कि देश की आर्थिक नीतियों में बहुत सारे तबके हाशिए पर ही रह गए हैं। हाशिए पर खड़ी महिला श्रमिकों को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिशों की कहानी है यह किताब।


प्रस्तावना में ही एक और बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू की ओर ध्यान दिलाते हुए इला जी ने सांप्रदायिक दंगों को गरीबों का सबसे बड़ा दुश्मन करार दिया है। अपने अनुभवों के आधार पर उनका मानना है कि किसी भी दूसरे कारणों की तुलना में सांप्रदायिक वैमनस्यता गरीबों पर बहुत बेरहमी से मार करती है। सेवा में काम करने के दौरान इला जी ने इस बात को पूरी शिद्दत से महसूस किया कि दंगों की आंच सबसे ज्यादा सबसे गरीब और कमजोर तबके को जलाती है। जरा कल्पना कीजिए उस महिला के दर्द को जो कई साल की मेहनत के बाद सेवा बैंक से कर्ज़ ले कर रहने के लिए एक छोटा घर बनाती है जो एक ही रात में दंगे की भेंट हो जाता है या उस औरत का दुख जिसकी कमाई का साधन कर्ज़ पर ली गई सिलाई मशीन दंगाइयों की मशाल के हवाले हो जाए। यह सच्ची दुनिया की कहानियां हैं जिन्हें इला जी ने इस किताब के जरिए सुनाने की कोशिश की है।


यह किताब महिलाओं के बीच किए गए उनके कामों का लेखा-जोखा होने के साथ हमारे समाज के जटिल खांचे को समझने के लिए एक बहुत अच्छी अध्ययन सामग्री है। इला जी ने बहुत ही संवेदनशील तरीके से राजनीति, अर्थव्यवस्था और जातिगत भेदभाव में लिपटी हमारी सामाजिक व्यवस्था के ताने-बाने को बहुत पैनेपन के साथ देखा, समझा और फिर कामकाजी गरीब महिलाओं को साथ ले कर उन्हीं के अनुभवों की मदद से आगे बढ़ने के रास्ते बनाए।


आज के दौर में हर कोई माइक्रोफाइनेंस की बात करता है लेकिन इलाजी ने कई साल पहले ही इसकी संभावना को पहचान लिया था और उसी का परिणाम था सेवा बैंक। इस बैंक की स्थापना ने कई मायनो में कई मिथकों को तोड़ा। बिल्कुल निचले आर्थिक तबके की महिलाओं की छोटी-छोटी बचत एक बैंक का मजबूत आधार बन सकती है यह बात ही अपने आप में अनूठी थी। अनिश्चित कमाई वाली महिला श्रमिकों पर भरोसा करके बैंक खोलने जैसा बड़ा कदम उठाना इला जी की मजबूत इच्छाशक्ति को दिखाता है। आर्थिक सलाहकारों ने इस फैसले को बेवकूफी भरा करार दिया था, लेकिन आज सेवा बैंक की सफलता सबके सामने है। सेवा बैंक से ऐसी महिलाओं को कर्ज़ मिलता है जिन्हें मुख्यधारा के बैंक कर्ज़ देना तो दूर आस-पास भी न फटकने दें।


यह किताब हमारे समाज के इतने सारे पहलुओं को छूती हुई निकलती है कि इसे संपूर्णता के साथ ले कर समीक्षा कर पाना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है। इस किताब के बारे में एक समीक्षक का कहना है कि, ' अगर आपको प्रेरणा लेनी है तो यह किताब पढ़िए। अगर आप जानकारी चाहते हैं तो यह किताब पढ़िए और अगर आप गरीबों को संगठित कैसे किया जाए यह जानना चाहते हैं तो यह किताब पढ़िए।' मुझे लगता है कि देश को समझने और उसे बेहतर बनाने की नियत रखने वाले हर जागरूक नागरिक को यह किताब पढ़नी चाहिए।

अप्रैल 13, 2010

बाबूजी तुम क्या-क्या खरीदोगे?

ऐसा कितनी बार होता है जब आप बाजार जाते हैं और किसी आकर्षक चीज पर नजर पड़ते ही उसे खरीद लेते हैं, बिना यह सोचे कि उसकी जरूरत है भी या नहीं? क्या आप भी जानते हैं ऐसे लोगों को जो दुकानों पर सेल यानी कीमतों में तथाकथित छूट की खबर लगते ही लपक लेते हैं खरीददारी करने? त्यौहार के मौकों पर बाजारों और मॉल्स पर उमड़ने वाली उन्मादी भीड़ को देख कर आपको नहीं लगता कि खरीददारी अब एक जरूरत न हो कर शौक बन गई है? बहरहाल, मैं बहुत सारे ऐसे लोगों को जानती हूं जिनके घर अंटे पड़े हैं चीजों से लेकिन उन्हें खरीददारी का ऐसा शौक या कहूं कि रोग है कि वो किसी गलत दुकान में भी घुस जाएं तो भी बिना खरीदे बाहर नहीं निकल सकते। कई लोग हैं जो जब उदास होते हैं तो मन खुश करने के लिए खरीदारी करते हैं और जब खुश होते हैं तो उसे मनाने के लिए खरीदारी करते हैं।


लेकिन क्या आप जानते हैं कि चीजें खरीदने की यह लिप्सा ही हमारे समय की लगभग सारी आर्थिक और सामाजिक समस्याओं की जड़ है? क्या आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि चीजें खरीदने की यह भूख ही हमारी दुनिया से सारी हरियाली खत्म कर रही है, हमारी नदियों को विषैला कर रही हैं? क्या आप सोच भी सकते है कि सामाजिक अन्याय के लिए भी लोगों का यही उपभोक्तावाद जिम्मेदार है। पूंजीपतियों और सर्वहारा के बीच की खाई को और चौड़ा करने, सरकारों को बड़े कॉरपोरेशनों को प्रश्रय देने की प्रवृति के पीछे भी यही कारण है? सुनने में बहुत अतिश्योक्तिपूर्ण और अटपटा सा लग रहा है न? लेकिन अगर आप ऐनी लियोनार्ड की केवल 20 मिनट की फिल्म 'Story of stuff' देखेंगे तो इन सारे असंगत से लगते तथ्यों को आपस में जोड़ कर देख पाना न केवल आसान होगा बल्कि आप सोच में भी पड़ जाते हैं कि इतनी सीधी सी बात आम आदमी के समझ में क्यों नहीं आती।


आज जब मौसमों के रंग-ढंग बदले-बदले से नजर आ रहे हैं तो हर कोई ग्लोबल वॉर्मिंग का रोना रो रहा है लेकिन कोई यह सुनने को तैयार नहीं है कि भाई इसके लिए कहीं न कहीं हम, हमारी जीवन शैली भी जिम्मेदार है। उपभोक्तावाद प्राकृतिक संसाधनों का बुरी तरह से दोहन करता है, इस धरती को प्रदूषित कर रहा है, इंसान में जहर भर रहा है, जीव जातियों को समाप्त कर रहा है, लोगों को गरीबी की ओर धकेल रहा है और इन सबके बीच ग्लोबल वॉर्मिंग का कारण बन रहा है।


उपभोक्ता आज छोटे के बाद बड़ा घर, बड़ी कार, सेलफोन का नया मॉडल या आधुनिकतम फैशन के कपड़े-जूते की भूख से जूझ रहा है। पड़ोसी की समृद्धि की जलन में सारा सुख-चैन भुलाए बैठा यह उपभोक्तावर्ग भला क्यों कर सोचेगा कि ये सारी चीजें दरअसल उसके लिए सुख का नहीं बल्कि दुख का कारण बन रही हैं। शोध के परिणामों पर गौर करें तो पता चलता है कि आज का आदमी भले ही समृद्धि के पैमाने पर बहुत आगे पहुंच गया हो लेकिन सुखी जीवन जीने के मामले में वह अपनी पिछली पीढ़ियों के मुकाबले पीछे होता जा रहा है। The story of stuff का संदेश यही है कि जरूरतों को कम करो और दुनिया को थोड़ा बेहतर बनाने में सहयोग दो।


हालांकि सामाजिक कार्यकर्ता ऐनी लियोनार्ड की 2007 में बनी यह ऐनीमेशन फिल्म पूरी तरह से अमेरिकी उपभोक्तावाद पर कटाक्ष करती है। इसमें दिए गए सारे आंकड़े भी अमेरिकी व्यवस्था पर आधारित हैं लेकिन तथ्य के दृष्टिकोण से यह लगातार बाजारोन्मुख हो रही दुनिया की सारी अर्थव्यवस्थाओं की सच्चाई है। आखिरकार अगर वह कहती हैं कि दुनिया के 80% जंगल खत्म हो चुके हैं या अमेजन में हर मिनट में 2000 पेड़ कट रहे हैं तो यह सारी दुनिया की साझी चिंता है।

इस फिल्म की सबसे दिलचस्प बात यह है कि केवल 20 मिनट में यह बहुत खूबसूरती से और तर्कसंगत तरीके से उपभोक्तावाद का पूरा अर्थशास्त्र समझा देती है। इस फिल्म के लिए ऐनी ने काफी देशों की यात्राएं की, प्रामाणिक तथ्य जुटाने के लिए शोध किए और बहुत गंभीर मुद्दे को बिल्कुल भी बोझिल बनाए बिना एक दिलचस्प ऐनीमेशन फिल्म बना डाली। छोटी फिल्म होने के कारण इसे बच्चों के लिए काफी प्रभावशाली माना गया। हालांकि अमेरिका में इस फिल्म का विरोध भी काफी हुआ, कई स्कूलों में इस फिल्म को प्रतिबंधित भी किया गया।

पूंजीवाद समर्थक लोगों के पास ऐनी की फिल्म का विरोध करने के अपने तर्क हैं जो आंकड़ों के स्तर कर एकाध जगह अगर उन्हें गलत साबित कर भी देते हैं तो उससे पूरी फिल्म की सार्थकता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 20 मिनट की यह फिल्म सात छोटे-छोटे हिस्सों में बंटी हैं जिसमें दिखाया गया है कि हमारी भौतिक जरूरतों को पूरा करने के लिए किस तरह से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन होता है, कैसे चीजों का उत्पादन होता है, कैसे उनका वितरण होता है, कैसे उत्पादों की खपत होती है, और कैसे चीजों से पैदा होने वाले कचरे का निस्तारण होता है। इस ऐनीमेशन फिल्म के जरिए वह बहुत प्रभावशाली ढंग से समझाती हैं कि इस उत्पाद के बनने से ले कर उसके कचरे में तब्दील होने की प्रक्रिया के बीच कितना कुछ नकारात्मक पैदा होता है जो इस दुनिया को बद से बदतर बना रहा है। नई चीजें खरीदने के बाद पुरानी चीज को कचरे में डाल कर हम इस दुनिया को कूड़ाघर में बदलते जा रहे हैं।


इतनी छोटी सी फिल्म का बहुत बड़ी सी समीक्षा करने का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि यह फिल्म और उससे जुड़ी तमाम बातें www.storyofstuff.com पर मौजूद है। फिल्म देखिए और अगली बार जब कोई चीज खरीदने लगें तो सोचिएगा जरूर कि उसकी जरूरत सचमुच है क्या?

जुलाई 20, 2009

एक सफर मंज़िल का

कल रात एक फिल्म देखी "दि डेड पोएट्स सोसायटी" , यह बोर्डिंग में पढ़ रहे कुछ किशोरों और उन्हें कविता पढ़ाने वाले अध्यापक (रोबिन विलियम्स) के बीच के भावनात्मक संबंधों की कहानी है। जी नहीं, यह पोस्ट इस फिल्म के बारे में नहीं है। दरअसल यह फिल्म देख कर मुझे एक और अध्यापक याद आया जो इस फिल्म के अध्यापक की तरह ही न केवल बच्चों का चहेता है बल्कि उनकी प्रेरणा का स्रोत भी है। उनके बारे में मैं बहुत दिनों से लिखना चाह रही थी लेकिन न जाने किन वजहों से लगातार टलता जा रहा था। बहरहाल इस फिल्म ने एक तरह से उकसाने का काम किया इसलिए आज की पोस्ट रवि यानि रवि गुलाटी के नाम।

रवि गुलाटी दिल्ली में कम आयवर्ग के बच्चों के लिए अपने घर में ही मंज़िल नाम से एक स्कूल चलाते हैं। घर का मतलब अगर आश्रय से होता है तो रवि का घर अपने अर्थ को पूरी संपूर्णता के साथ सार्थक करता है। उनकी बहन सोनिया का गर्मजोशी भरा स्वागत, निश्चल हंसी और निरंतर चलने वाली बातें पहली बार आने वालों को भी पुराने दोस्तों का सा सहज बना देती है। फिर आप मिलते हैं ममत्व को नए अर्थों में परिभाषित करती रवि की मां श्रीमति इंदिरा गुलाटी से, जिन्होंने अपनी जिंदगी के पिछले 35-40 साल खास जरूरतों वाले बच्चों को इस कठिन दुनिया में जीने के सबक देने में बिताए हैं। वह अब भी पूरी सक्रियता के साथ जुटी रहती हैं मंज़िल के कोटला मुबारकपुर वाले केंद्र से संचालित होने वाले अपने सेवा कार्यों में।

रवि के बारे में सबसे ज्यादा प्रभावशाली चीज़ है सादगी जो उनके बेपरवाह पहनावे से ले कर समाज व दुनिया के बारे में संजीदा सोच सब में बहुत साफ नज़र आती है। कहीं शब्दों का आडंबर नहीं, कहीं अपने विचारों को सही ठहराने की आक्रमकता नहीं, कोई लाग-लपेट नहीं बस सीधी सच्ची व्यवहारिक बात। वह अमेरिकी साम्राज्यवाद की आलोचना करते हैं बिना उत्तेजित हुए शांति से अपने तर्क देते हुए। कभी गांधी की किसी बात की सार्थकता साबित करेंगे बहुत साधारण लेकिन अकाट्य उदाहरण के साथ। दूसरे की बात को पूरा महत्व देते हुए सुनना उनकी एक और विशेषता है। दोस्तों की मंडली में गिटार के सुरों पर अंग्रेजी गाने गाते-गाते वह उसी तन्मयता के साथ मालवा शैली में कबीर भी गाने लगते हैं।


रवि गुलाटी दिल्ली के धनपतियों के इलाके खान मार्केट में रहते हैं लेकिन उनकी बाबस्तगी पङोस के आलीशान घरों की बजाय उनके सर्वेंट क्वार्टस में रहने वाले नौकरों, धोबियों, साइकिल की दुकान पर काम करने वाले कारीगरों जैसे कम आयवर्ग के लोगों से रही है। सीमित आय में जैसे-तैसे गुज़ारा करके भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला कर बेहतर भविष्य का सपना देखते इन लोगों के सपनों को सच बनाने के लिए रवि ने अपने घर के दरवाजे उन बच्चों के लिए खोल दिए और उसे नाम दिया मंज़िल। हालांकि रवि ने आईआईएम, अहमदाबाद से गुर तो कॉरपोरेट प्रबंधन के सीखे लेकिन मंज़िल में उनकी भूमिका अध्यापक की रही। बच्चों को पढ़ाते हुए उन्हें अहसास हुआ कि हमारे स्कूलों में पढ़ाने के तरीके कितने गलत हैं, वो सिर्फ रटना सिखाते हैं, जानना नहीं। उन्होंने बच्चों को दिलचस्प और सरल तरीके से गणित और अंग्रेजी सिखानी शुरू की।

मंज़िल में 1998 से बच्चों के आने का सिलसिला जो शुरू हुआ वो अब तक जारी है। यहां बच्चे गणित, अंग्रेजी और कंप्यूटर खुद पढ़ते भी हैं और दूसरे बच्चों को पढ़ाते भी हैं। यहां सिर्फ पढ़ाई ही नहीं, गाना- बजाना, थियेटर, कला सब कुछ होता है। यहां के बच्चों का एकम् सत्यम नाम से अपना एक म्यूज़िक बैंड भी है। मंज़िल इन बच्चों के लिए अपना घर है शायद उससे कुछ ज्यादा ही है। यह जगह हमेशा गुलज़ार रहती है उनके शोर से, गीत-संगीत से, बातों से। यह जगह हमेशा युवा उर्जा से भरी रहती है जिसे आप वहां उपस्थित हो कर स्वयं महसूस कर सकते हैं। रवि के इस स्कूल में कोई फीस नहीं ली जाती। हालांकि अनुशासन बनाए रखने के लिए कक्षा में देर से आने पर उन्हें मामूली सा जुर्माना देना पढ़ता है।

अधिकांश किशोरवय के इन बच्चों के साथ रवि का व्यवहार हमउम्र जैसा रहता है जिसके चलते उनमें न केवल आत्मविश्वास बढ़ता है बल्कि उनमें नेतृत्व करने जैसे गुण भी विकसित होते हैं। यहां उनकी कल्पनाशीलता, स्वतंत्र सोच को पूरा सम्मान दिया जाता है। यही वजह है कि अब रवि की गैर-मौज़ूदगी में भी मंज़िल का काम-काज बिना किसी रूकावट के चलता रहता है वो चाहे पढ़ाने का काम हो या थियेटर जैसी कोई गतिविधि। यह किसी भी संस्था के कामकाज का आदर्श तरीका है क्योंकि अक्सर व्यक्तिगत प्रयासों से शुरू हुई कोई मुहिम व्यक्ति केंद्रित ही हो कर रह जाती है।

रवि से जब भी कोई पूछता है तुम लोग क्या सिखाते हो बच्चों को तो उनका जवाब हमेशा यही होता है मंज़िल में आओ, मेरे बच्चों से मिलो। सचमुच मंज़िल के बच्चों से मिल कर पता चलता है कि रवि से उन्हें क्या मिला है मूल्यों के प्रति आस्था, आपसी सहयोग से आगे बढ़ने की प्रवृति और आत्मविश्वास से लबरेज़ इन बच्चों में सबसे अच्छी बात यह लगती है कि ये अपनी गरीब पृष्टभूमि को ले कर बिल्कुल भी शर्मिंदा नहीं हैं। वो जानते हैं उन्हें इस जमीन पर खङे हो कर ही ऊंचाइयां छूनी है और वो कोशिश कर रहे हैं। और एक ईमानदार कोशिश से ज़्यादा चाहिए भी क्या? यही वजह है कि इनमें से बहुत से बच्चे, जो दरअसल अब बङे हो चुके हैं, अपनी-अपनी रुचि के कार्यक्षेत्रों में अच्छा काम कर रहे हैं। रवि के दोस्तों का दायरा काफी बङा है, समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय ये लोग समय-समय पर मंज़िल के बच्चों का मार्गदर्शन करते रहते हैं।

रवि परस्पर संवाद को महत्वपूर्ण मानते हैं इसलिए ये बच्चे रवि भैया से दुनिया-जहान की बातें करते हैं और उन बातों से सीखते हैं कि गरीबी या अंग्रेजी न आना ऐसी कोई चीज़ नहीं हैं जो आगे बढ़ने से रोक पाएं। अंग्रेजी एक भाषा मात्र है जिसे चाहो तो कोशिश करके सीखा जा सकता है। रवि बहुत गर्व से बताते हैं कि मेरे बच्चे अगर कुछ सीखना चाहते हैं तो उसके जानकार के पास पहुंच जाते हैं, अगर कोई सिखाने से मना करता है तो वो किसी दूसरे के पास पहुंच जाते हैं वहां भी सुनवाई न हुई तो फिर अगले के पास पहुंच जाते हैं बिना दिल छोटा किए। वो जानते हैं अगर वो सीखना चाहते हैं तो ऐसे लोग भी हैं जो सिखाना चाहते हैं, इसलिए वो कोशिश करना नहीं छोङते। ये हार न मानने वाली बात रवि का मूलमंत्र है अपने बच्चों के लिए, तो फिर हारने की गुंजाइश है कहां?

रवि को मैं व्यक्तिगत तौर पर जानती हूं और उन्हें जानने वाला हर कोई यह जानता है कि वह कितने निस्वार्थ भाव से यह काम करते हैं। बदले में किसी तरह की पहचान या सम्मान जैसी चीज़ों के बारे में सोचे बिना चुपचाप कुछ जिंदगियों को बेहतर बना रहे रवि जैसे लोग इंसान और इंसानियत की ताकत पर भरोसा बनाए रखते हैं। किशोरावस्था जैसी नाज़ुक उम्र में इन युवा उर्जाओं को सही दिशा दिखाने और उनको आगे बढ़ने में मंज़िल की भूमिका के बारे में और जानना चाहें तो www.manzil.in पर एक नज़र डालना न भूलें।

अप्रैल 11, 2009

...इस दुनिया को बस अब बदलना चाहिए

इतिहास और भूगोल कभी भी न तो मेरे पाठ्यक्रम में शामिल थे न मेरे पसंदीदा विषयों की सूची में, लेकिन अब मुझे लगता है कि ये दोनों महत्वपूर्ण विषय अगर मैंने पढे होते तो समाज के बारे में, दुनिया के बारे में मेरी समझ बहुत बेहतर होती। तब शायद अफगानिस्तान मेरे लिए पाकिस्तान की सीमा से लगा एक मुश्किल भौगोलिक परिस्थितियों वाला, अलकायदा को पनाह देने वाले एक मुसलिम देश के अलावा कुछ और भी होता। तब शायद मैं जान पाती कि वहां पारदर्शी पानी से भरी नदियां भी हैं और लहलहाते खेत भी थे। इतिहास मुझे बताता कि कैसे ताकतवर देश अपनी बादशाहत के लिए किसी दूसरे देश को बरबादी की किस हद तक ले जा सकते हैं। कट्ठरवादिता कैसे मासूम बच्चों को तालिबान बना देती है, मुजाहिदीन बना देती है, जिंदा बम बना देती है यह सब मुझे बेहतर तरह से मालूम हो पाता।


तब शायद मुझे यह बात समझनी ज़्यादा आसान लगती कि किसी भी देश में ज़्यादातर आम लोग होते हैं जो गिने-चुने लोगों की सियासतों के बीच जीते हैं। यह भी पता होता कि वहां कट्ठरपंथियों की दहशत तले भी लङकियां प्यार करती हैं, परिवार बनाती हैं। वहां भी लाल-लाल गालों वाले खूबसूरत बच्चे गलियों में वही खेल खेलते हैं जो सारी दुनिया के सारे बच्चे खेलना जानते हैं। शायद तब ये सोचना ज़्यादा स्वाभाविक लगता कि वहां भी बच्चे मां की आंख का तारा होते हैं और जब वो किसी और की लङाई कि ज़िहाद समझ कर लङते हुए जवान होने से पहले ही मर जाते हैं तो उस मां का दुख दुनियां में किसी भी मां के दुख जैसा होता है।


पिछले दिनों अफगानी लेखक खालिद हुसैनी की दूसरी किताब a Thousand splendid suns पढने के बाद मुझे शिद्धत से इस बात का अहसास हुआ कि अखबारी खबरों से किसी समाज को किसी खास छवि में बांध देना कितना गलत है। पेशे से डॉक्टर खालिद हुसैनी अफगानिस्तान में पैदा हुए और अस्सी के दशक में उनका परिवार शरणार्थी के रूप में अमेरिका जा बसा। दो-ढाई साल पहले उनकी पहली किताब the kite runner पढी थी जो मुझे बहुत अच्छी लगी। यह एक मर्मस्पर्शी कहानी है सत्तर के दशक में काबुल में रहने वाला १२ साल का बिन मां का आमिर अपने प्रभावशाली पिता की नजर में खुद को बहादुर साबित करना चाहता है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर होने वाले पतंगबाजी मुकाबले को जीतना उसका लक्ष्य है। आमिर यह मुकाबला जीत जाता है लेकिन उसी दिन उसके खास दोस्त हसन के साथ हुआ हादसा उसे गहरी आत्मग्लानी से भर देता है। अपनी कमतरी को छिपाने के लिए वह हसन पर चोरी का आरोप लगा कर अपने अहाते में बने नौकरों वाले घर से निकलवा देता है। आगे चल कर दोनों की जिंदगियां क्या मोङ लेती हैं, वो है इस उपन्यास की कहानी। हालांकि आमिर और हसन दोनों में से कोई भी नायक नहीं है, इसका मुख्य पात्र है दिनों दिन बद से बदहाल होता अफगानिस्तान। बदलते राजनीतिक हालत किस तरह से आम आदमियों की जिंदगियों की दशा दिशा कैसे बदलते हैं, इसे एक बहुत ही दिलचस्प कहानी के जरिए कहा गया है the kite runner में।


पिछले दिनों जब मैंने खालिद हुसैनी की A thousand splendid suns पढी तो ज्यादातर हिस्सा डबडबाई आंखों से ही पढा गया। ये बहुत उदास लेकिन बहुत खूबसूरती से लिखी गई किताब है। यहां भी कहानी का मुख्य पात्र अफगानिस्तान ही है। लेकिन यहां औरतों की दुनिया में झांका गया है। इस कहानी में एक मरियम है और एक लैला है। एक अमीर बाप की अवैध संतान है और एक तरक्कीपसंद पिता की लाङली। एक अपने पिता को शर्मिंदगी को छिपाने की मजबूरी में और दूसरी बम विस्फोट में परिवार को खो देने के बाद बने हालातों में एक ही आदमी की बीबी बनती हैं। 15 साल की मरियम से जब राशिद ने शादी की तो उसकी उम्र थी लगभग 45 साल और 27 साल बाद जब उसने दूसरी शादी की तो लैला की उम्र भी 15 ही साल थी। ये अफगानिस्तान की औरतों की बेबसी और उससे मुक्त होने की उनकी कोशिशों की कहानी है।


ये बिल्कुल संयोग ही था कि इस किताब के बाद मैंने जो फिल्म देखने के लिए चुनी वो थी पाकिस्तान के फिल्मकार सोएब मंसूर की 'खुदा के लिए' । संयोग इसलिए कि खालिद हुसैनी की दोनों किताबें और यह फिल्म एक सी नहीं तो काफी मिलती जुलती सी परिस्थितियों की कहानी कहती हैं । फिल्म 'खुदा के लिए' बहुत तर्कसंगत रूप से पाकिस्तान के बारे में आम आदमी की गलतफहमियों को दूर करती है। यह 9/11 के बाद पाकिस्तान के आम तरक्की पसंद मुसलमान की कशमकश को बयान करती एक बढिया फिल्म है । इस फिल्म का सबसे प्रभावशाली हिस्सा वो है जहां ब्रिटेन में रह रहा एक पाकिस्तानी अपने दीन की हिफाज़त के लिए बेटी मरियम को धोखे से पाकिस्तान ले जा कर उसे बिना बताए उसकी शादी कर अफगानिस्तान के एक गांव में छोङ आता है। यह एक रोंगटे खङे कर देने वाला दृश्य है। यह फिल्म इस्लाम के नाम पर फैले बहुत से भ्रमों को बहुत खूबसूरती के साथ दूर करती है।एक खालिद की मरियम है जो कुरान के कुछ अक्षर बांच पाती है और जो दुनिया के बारे में बस उतना ही जानती है जितना बचपन में उसके पिता ने और शादी के बाद उसके पति ने बताया। सोएब मंसूर की मरियम इंग्लैंड में पली बङी आज़ाद खयाल लङकी है। लेकिन विडंबना देखिए कि दोनों के बाप उनकी मर्जी के खिलाफ उनकी जबरन उनकी शादियां करवाते हैं। आखिर क्यों होता है औरतों के साथ ‌ऐसा हर कहीं?

ये दोनों किताबें और यह फिल्म काफी पहले आ चुके हैं लेकिन चूंकि मैंने ये अब पढीं और देखी और मन किया कि लिखूं सो लिख डाला।

मार्च 13, 2009

ये रंग होली के नहीं हैं….


आंखे पहले हाथ में पकङाई गई चीज़ पर नज़र डालती हैं और फिर शर्मिली मुस्कराहट के साथ जब वो मुझे दोबारा देखती हैं तो एक खास किस्म की खुशी से चमक रही होती हैं। लगभग हर बच्चे की प्रतिक्रिया एक सी होती है। हर बार बच्चों की आंखों में वो चमक देख कर मैं सोचती हूं कि इस बार तो अतिमा भाभी को फोन करके एक बहुत बङा वाला धन्यवाद देना है जिनकी वजह से किसी को खुश करने के खुशगवार पल मुझे मयस्सर होते हैं। बच्चों को उल्लास से भर देने वाली वो भेंट होती हैं खूब सारे पेंसिल वाले रंग।


पिछले तीन-चार साल से कम से कम दो सौ बच्चों को रंगीन पेंसिलों के तोहफे मेरे हाथों से बंट चुके हैं। ये वो बच्चे हैं जिनके लिए रंगीन पेंसिलें खरीद पाना मुश्किल नहीं तो आसान भी नहीं हैं। आमतौर पर निम्न आयवर्ग परिवार के इन बच्चों के अभिभावकों के लिए उनके लिए बहुत जरूरी चीजें जुटा पाना भी मुश्किल होता है। कापी-किताब और पेंसिल या पेन मिल जाए वही बहुत है। ऐसे में अच्छी क्वालिटी की भले ही थोङी बहुत इस्तेमाल की हुई बीस-पच्चीस पेंसिल वाले रंगों का तोहफा बच्चों के खास ही होता है।


थोङी बहुत इस्तेमाल की हुई ये पेंसिलें मेरे पास पहुंचती हैं अतिमा भाभी के द्वारा सिंगापुर से। भाभी का पूरा नाम अतिमा जोशी है जो अपने पति नीरज जोशी और एक किशोरवय बेटी नीतिमा के साथ सिंगापुर में रहती हैं और एक स्कूल में पढाती हैं। वहां पढाते हुए उन्होंने देखा कि उनकी क्लास में बच्चे स्टेशनरी का बहुत ही लापरवाही के साथ इस्तेमाल करते हैं। पेन, पेंसिल, रंग, पेंसिल शार्पनर जैसी चीजें थोङे से प्रयोग के बाद फेंक दी जाती हैं।


हिंदुस्तान जैसे देश में मध्यमवर्गीय परिवार में पले-बङे संस्कारी मन से ये बरबादी हजम न होनी थी न हुई। सो उन्होंने बेकार समझ कर फेंक दी गई उन रंगीन पेंसिलों को इकट्ठा करना शुरू किया और अपनी सालाना यात्रा में जब हिंदुस्तान आईं तो रंगों की वो पोटली साथ लाना नहीं भूलीं। अच्छी खासी भर चुकी उस पोटली से कुछ रंग उन्होंने खुद बांटे और कुछ मुझे दे दिए। लगभग तीन साल पहले शुरू हुआ यह सिलसिला तब से बरकरार है।


यहां इस पोस्ट का मकसद किसी को महिमामंडित करना नहीं है बल्कि सिर्फ यह बताना भर है कि थोङी सी सकारात्मक सोच और थोङी सी पहल थोङी सी ही सही लेकिन इतने सारे बच्चों के लिए खुशी का सबब बन गई। बच्चों की दुनिया को रंगीन बनाने के लिए यह छोटी सी पहल भी कितनी महत्वपूर्ण है, हाथ में पेंसिल पकङे बच्चे की उछाह भरी मुस्कान मुझे बहुत अच्छी तरह से बता देती है।

मेरे ब्लॉग पर आने वाले सभी परिचित, अपरिचित मित्रों को होली मुबारक। इस होली में रंग न केवल तन को बल्कि मन और सपनों को भी रंगें।