जून 03, 2011

दूर छिपे उन दिनों का सपना

(आज लगभग दस सालों बाद लिखी गई कवितानुमा कोई चीज़)
अखबार के पहले पन्ने पर रोते-बिलखते लोग
बम फटने से मरे लोगों के परिजन
बसे रहते हैं दिन भर मन में कहीं
अंधेरी डरी रात में खुली आतंकित आंखों में
धीरे से उतरता है एक सपना


दूर अनंत में छिपे दिनों का
जिनमें हमेशा घर लौटेंगे हंसते हुए पिता,
बच्चों के लिए दूर तक पसरा होगा मां का आंचल
तब खून सिर्फ रगो में दौड़ने वाली चीज़ ही होगा
सड़क जैसी सार्वजनिक जगहों पर फैलने वाला रंग नहीं
गीत होंगे बहुत सारे और खूब रंग भी
किलकारियां, रोशनी और खुशियों जैसी होंगी बहुत सी चीज़ें
हां...हां...हरे पेड़, चमकदार पानी और खूशबूदार हवा जैसी
ज़रूरी चीज़ें तो होंगी ही!!!


नहीं होंगी तो बम, हथियार जैसी फालतू चीज़ें
तोप, फौजें और लड़ाके ज़रूरी नहीं होंगे उन दिनों में
हां वर्दी वाले चाहें तो खड़े हो सकते हैं
उस मैदान के चारों ओर...जहां बच्चे खेलते हैं मनचाहे खेल
और कर सकते हैं मैदान से बाहर आ गिरी गेंद को
फिर से बच्चों को थमाने जैसा ज़रूरी काम


आतंक के बीच नींद से रीती आंखों में
अनंत में छिपे उन दिनों का सपना चुभता क्यों है???

मई 02, 2011

नीमा


इन दिनों जब भी शाम को ठंडी हवा को बांज की पत्तियों के साथ सरगोशियां करते सुनती हूं नीमा की याद अनायास ही आ जाती है। मैं जब पहाड़ों के इस खूबसूरत मौसम का मज़ा ले रही हूं वो बेचारी पहाड़ की लड़की देस की गरम हवा में झुलस रही है। नीमा का मायका मेरे पड़ोस में है, उसकी शादी दो साल पहले हुई थी तब से वह अपने ससुराल मथुरा में रहती है। मुझे इस गांव में रहते हुए अब सात साल से ज़्यादा अरसा हो गया है, लेकिन मेरे पड़ोस में नीमा नाम की कोई लड़की रहती है इसका पता मुझे चारेक साल पहले ही लगा। दरअसल गांव की एक शादी में दुल्हन को मेहंदी लगाने की ज़िम्मेदारी मैंने ले ली थी, जिसके लिए अगले दिन शाम को उसके घर जाना था लेकिन अंधेरे में अकेले कैसे लौटूंगी, मुझे यह डर सता रहा था। महिला संगीत के दौरान जब मैं अपनी यह समस्या बता रही थी तो कुछ लड़कियों के बीच में से एक दुबली-पतली सी लड़की तपाक से बोली, "अरे बोज़्यू (पहाड़ में भाभी के लिए संबोधन), डर क्यों रहे हो, मैं छोड़ दूंगी आपको घर। मैंने पहली बार उस लड़की को देखा था, मैंने कहा, "फिर तुम्हें भी तो घर छोड़ने जाना पड़ेगा किसी को….कहां रहती हो?" मेरे जवाब से उसके चेहरे पर साफ नागवारी के भाव उभरे। "क्यों मुझे नहीं पहचान रहे हो बोज्यू, मैं नीमा हूं आपके पड़ोस में तो रहती हूं।"


यह पहली बार नहीं था कि मुझे अपने आसपास के लोगों से कोई मतलब नहीं रखने के शहरी रवैये के चलते शर्मिंदा होना पड़ा था...इसलिए तुरंत झेंपते हुए सफाई दी, "अरे नीमा तू है...बहुत दिनों बाद दिख रही है इसलिए पहचान नहीं पाई।" जबकि सच तो यह था कि मैंने सचमुच उसे पहली बार देखा था और पड़ोस में रहने वाली बात तो और भी चकराने वाली थी क्योंकि जहां मैं रहती हूं वहां चारों ओर सिर्फ जंगल है और दूर केवल एक घर नज़र आता है जहां रहने वाले केयरटेकर के परिवार को मैं जानती थी इसलिए पता था कि वहां नीमा नाम की कोई लड़की नहीं रहती। बहरहाल दूसरे दिन शाम को शादी में मैं जब दुल्हन के हाथ में मेंहदी लगा रही थी तो पिछले दिन की तरह उस दिन भी आसपास की कई सारी लड़कियां वहां जमा थीं जो दुल्हन की सहेलियां थीं। सबसे ज़्यादा चुहलबाजी नीमा ही कर रही थी। दुल्हन के हाथ में मेरी लगाई मेहंदी सराहते हुए उसने कहा, "बोज़्यू मेरी शादी में भी मेहंदी आप ही लगाना....ठीक है?" सारी लड़कियां ढकती-छिपाती शर्मिली हंसी के बीच उसे झिड़कते हुए कहने लगी, "छि रे...कैसी है ये नीमा...देखो तो कैसी बेशर्म की तरह अपनी शादी की बात कर रही है। नीमा तुरंत पलट कर बोली, "क्यों रे..तुम लोग नहीं करने वाले हो क्या शादी? इनके सामने क्या शर्माना...हैं ना बोज़्यू?  मैं चुपचाप हंसते हुए उनकी बातें सुन रही थी।


वापस लौटते हुए जब मैं नीमा से बात करने लगी तब मुझे अंदाज़ा हुआ कि शादी उसके लिए युवावस्था में कदम रख रही एक लड़की की स्वाभाविक इच्छा नहीं थी वो उसकी एकमात्र उम्मीद थी उस माहौल से निकलने की जहां उसकी उम्र की खूबसूरती का साथ देने के लिए कुछ भी नहीं था। उसी ने बताया कि मेरे घर की पीछे से ऊपर की ओर बांज के जंगल के बीच जो पगडंडी जाती है उसी के मुहाने पर जो घर है वहीं वह रहती है। "घर में कौन-कौन हैं?" मुझे सचमुच खुद पर शर्म आ रही थी कि मेरे इतने पास में कोई परिवार रहता है जिसके बारे में इतना समय यहां रहने के बावजूद मुझे कुछ नहीं पता। "बाबू तो घर छोड़ कर चले गए, ईजा है, एक भाई दिल्ली में नौकरी करता है,  बड़ा भाई है उसका पैर खराब है इसलिए बेकार बैठा है।
"तू स्कूल जाती है?"
"नहीं तो...पहले जाती थी नौ में थी तो ददा का पैर टूट गया। ईजा रोज उसे दिखाने कभी हल्द्वानी, कभी अल्मोड़ा ही जाने में रहने वाली हुई...फिर घर का कौन करता...भैंस भी तो ठैरी...दूध देने वाली हुई नहीं..खाली घास लाने का काम बढ़ाना हुआ उसने भी...फिर कैसे जाती स्कूल इसलिए छोड़ दिया। अब तो तीन-चार साल जो हो गए स्कूल छोड़े।" खालिस कुमाउंनी लटक वाली हिंदी में उसने अपनी स्थिति बयान की।


मुझे छोड़ कर जब वो जाने लगी तो उसकी नानुकुर के बावजूद मैंने उसे अकेले नहीं भेजा। अगले दिन खोजबीन करने पर पता चला कि उसके भाई की, जो अच्छा-खासा स्वस्थ जवान लड़का था, तीन चार साल पहले गिरने की वजह से एक पैर की हड्डी टूट गई थी जिसे जोड़ने के लिए डॉक्टरों ने स्टील की रॉड डाल दी थी, फिर हुआ ये कि कुछ अरसे बाद उसी पैर में दोबारा चोट लग गई जिससे अंदर पड़ी रॉड टूट गई। गरीबी के चलते पैर का इलाज अच्छी तरह नहीं हो सका और एक बड़ा घाव बन गया जो हमेशा रिसता रहता था। जवान लड़का था, इतने समय तक पैर के चलते लाचार हो जाने से वह अवसादग्रस्त हो गया था। धीरे-धीरे जड़ जमाते स्रिजोफेनिया से वह बहुत आक्रामक हो गया था और जब-तब गुस्से में मां और बहन को मारने पर आमादा हो जाता था। कभी-कभी तो मां-बेटी को घर से भाग कर जंगल में छिप कर जान बचानी पड़ती थी। थोड़ी ही दूरी पर उनके रिश्तेदारों के घर थे लेकिन आपसी राग-द्वेष रिश्तों पर भारी पड़ने की वजह से उनका कोई सहयोग नहीं मिलता था।


उस दौरान उसके पैर का घाव कुछ ज़्यादा ही रिसने लगा था तो बेचारी मां जब उसे ले कर अल्मोड़ा दिखाने गई तो किसी डॉक्टर ने उसे डरा दिया कि ये तो गैंगरीन हो गया है अब पैर काटने के सिवा कोई चारा नहीं है। यह बात नीमा से मेरी पहली मुलाकात से कुछ दिन पहले की ही थी इसलिए नीमा भाई को ले कर बहुत परेशान थी। इसे संयोग ही कहना होगा कि अगले ही दिन हल्द्वानी के एक अस्थि रोग विशेषज्ञ यूं हीं कहीं से घूमते-फिरते हमारे यहां कुछ देर के लिए आए। जैसे ही पता लगा कि वह हड्डियों के डॉक्टर हैं उन्हें नीमा के भाई के बारे में बताया गया तो उन्होंने कहा कि वह  मरीज़ को देखना चाहेंगे। उसका मुआयना करने के बात पाया गया कि इलाज संभव है। खैर लंबी कहानी का लब्बोलुआन ये कि दो ऑपरेशन के बाद उसका पैर बिल्कुल ठीक हो गया और वह चलने फिरने लगा


अब नीमा और उसकी ईजा से मेरा अक्सर रोज़ ही मिलना हो जाता था और उनसे अजब सा मोह भी हो गया था। उनकी बातें सुन-सुन कर मुझे औरतों के दुखों की रोज नई सीमाएं तय करने पर मजबूर होना पड़ता था। अगले एक-डेढ़ साल में उनके हालात कुछ बेहतरी के लिए बदले। नीमा के भाई की दिमागी बीमारी का इलाज भी अब चालू हो गया था और उसके व्यवहार में काफी सुधार आ गया था। नीमा की ईजा रिश्तेदारी में जहां-तहां हाथ-पांव जोड़ मिन्नतें करने के बाद उसके लिए एक रिश्ता जुटा लाई। लड़की की शादी के बहाने नाराज़ हो कर दूसरे गांव में रह रहे उसके बाबू भी घर लौट आए थे। उनके घरेलू मसले में अपनी आत्मियता के बल पर जितना भी हक जता सकती थी उसका पूरा इस्तेमाल करते हुए मैं कम से कम इतना तो सुनिश्चित करने में कामयाब रही थी कि नीमा किसी दबाव में आ कर शादी न करे, लड़का उसे पसंद हो, व्यसनी न हो और एक अदद ठीक-ठाक नौकरी उसके पास हो। नीमा की शादी के सामान की खरीददारी मैंने जिस मन से और जिस खुले दिल के साथ की मैंने खुद की शादी के लिए भी नहीं थी, शायद ये मेरा अपनी इतनी नज़दीकी पड़ोसी के दुखों से इतने समय तक अनजान रहने का अपराधबोध कम करने का ज़रिया था।


बहरहाल, नीमा खुश थी उसे लड़का पसंद आया था। ससुराल में खेती-बाड़ी होती थी और वो लोग संपन्न थे। नीमा जब ससुराल से पहली बार आई थी तो उसने खूब हंस-हंस कर वहां के लोगों के बोलने की नकल करके बताई। "बोज्यू, पता नही हो क्या बोलते हैं मुझे तो कुछ समझ नहीं आता। मेरे ससुरजी कहते हैं हमारी बहू तो अंग्रेज़ी बोलती है, देखो तो मेरी हिंदी को जो अंग्रेज़ी कह रहे हैं...अंग्रेज़ी जो बोल दूंगी तो पता नहीं क्या समझेंगे।" और फिर वही अपनी वही चिरपरिचित खिलखिल हंसी। पता नहीं इतने कष्टों, दुखों के बीच भी वह अपनी सहज हंसी को कैसे बचा ले गई थी। लेकिन उसी हंसी के चलते मुझे डर भी लगता था कि कहीं इसके नीचे फिर कोई दुख तो नहीं छुपा रही है ये लड़की।
इसलिए पूछा, "तू सचमुच खुश तो है न नीमा?”

अबकी बार उसने मेरी आंखों से आंखे मिलाते हुए बहुत शांत आवाज में कहा, "हां बोज़्यू, अब मैं खुश हूं। वो मेरा बहुत ध्यान रखते हैं, उनके यहां औरतें घूंघट करती हैं लेकिन मैंने उनसे कहा कि मुझसे सिर नहीं ढका जाता तो उन्होंने कहा कि ठीक हैं तो मत ढको। उनके घर में औरतों से खेतों का काम नहीं कराते, वो सिर्फ घर का कामकाज करती हैं। यहां घर-बण-जानवरों के साथ इतना खटने के बाद मुझे वहां की जिंदगी बहुत आराम की लगती है। वहां सब मुझे बहुत प्यार करते हैं, सोचते हैं मैं छोटी हूं...पूछते हैं मुझे बाज़ार से कुछ सामान तो नहीं मंगाना, इनकी छुट्टी होती है तो मुझे घुमाने भी ले जाते हैं देखो इतनी जल्दी मैं वृंदावन भी घूम आई जबकि शादी से पहले मैं सिर्फ तीन बार गांव से बाहर कहीं गई थी, दो बार तल्ला रामगढ़ और एक बार अल्मोड़ा। बोज़्यू मैं खुश हूं लेकिन....."

"...लेकिन क्या नीमा?" मेरा दिल एक बार सहम सा गया।

"बोज्यू वहां मुझे जंगल की बहुत याद आती है, सच्ची कहूं वहां बहुत कम पेड़ हैं। दूर तक खेत ही खेत हैं बीच-बीच में पेड़ों की पतली सी लाइन। पेड़ भी पता नहीं कौन-कौन से हैं बांज जैसा कोई नहीं। मुझे सपने आते हैं कि मैं भैंस को घास चराने जंगल गई हूं और बांज के पेड़ के नीचे लेटी हूं। बोज्यू सच्ची बहुत नराई लगती है कहा जंगल की मुझे"....कहते-कहते आंख भर आई नीमा की। अब तक नीमा को जानते हुए मुझे कुछ साल हो चुके थे, अपने घर में मां-बाप के कलह, उनके झगड़ों के चलते जगहंसाई, चाचा-ताई के परिवार की उपेक्षा और प्रताड़ना भरे व्यवहार, भाई की बीमारी जैसी कई मुश्किल बातें उसने कई बार मुझसे साझा की थी लेकिन बिल्कुल तटस्थ भाव से जैसे किसी और की तकलीफों की बात कर रही हो। आज पहली बार उसकी आंखों में आंसू थे....किसके लिए? जंगल के लिए।


है न अजीब सी बात? शायद नहीं....वो सिर्फ जंगल नहीं होगा नीमा के लिए। सोचो तो नीमा जैसी घुटनभरी परिस्थितियों में रहने वाली किसी लड़की के लिए  क्या मायने रहे होंगे जंगल के? एक जगह जहां वो तमाम परेशानियां कुछ देर के लिए ही सही भूल सकती हो, शायद कुछ पेड़ हों जिनके साथ वह अपने सपने साझा करती हो, अपने दुख बांट कर हल्का करती हो। वरना हंस-हंस कर हर दुख सह जाने वाली नीमा प्यासे को पानी की तरह अपने नए-नए मिले सुखों के बीच एक जंगल को याद करके क्यों रोती। मेरा गला भर आया था समझ नहीं आ रहा था उसे क्या कहूं।


फिर आंसू पोछ कर अपनी उसी शरारती हंसी के साथ उसने कहा, "अपना जंगल मुझे अब वहीं बनाना पड़ेगा। इस साल बरसात में मैंने अपने घर के आगे छह-साल पेड़ लगा दिये हैं, एकाध तो फल के पेड़ हैं बाकी पता नहीं किसके थे, मुझे अच्छे लगे मैंने रोप दिए। सब जम गए हैं। बोज्यू बांज जम जाएगा क्या वहां?  ईजा कह रही थी खुबानी, पुलम तो नहीं जमेंगे वहां। इस बार आढ़ू और बांज लगा कर देखूंगी क्या पता लग ही जाएं। बोज्यू वहां हमारा घर खूब बड़ा है, पीछे को एक खिड़की खुलती है वहीं रोपूंगी बांज........नीमा बोलती जा रही थी और मैं चुपचाप सुन रही थी।

पता नहीं नीमा ने पिछली बरसात में अपने पहाड़ के पेड़ रोपे या नहीं....फिलहाल गर्मियां आ चुकी हैं और मैं पहाड़ की ठंडी हवा के बीच नीमा को याद कर रही हूं।

अक्टूबर 20, 2010

छप चुका है सब!!

(उसी फटती डायरी से अलग हुए एक और पन्ने पर लिखी कुछ पंक्तियां)

लिखा जा चुका है सब पर,
धरती, आकाश और इन दोनों के बीच
मौजूद हर चीज़ पर
जिंदा आदमी से जुड़ी-अनजुड़ी
हर चीज़ पर

सुख इतना सारा मन के अंदर का
सब फैल चुका कागज़ पर
सुख बसंत सा और न जाने कितनी
सुखद उपमाओं वाला,
और दुख तो जैसे
अनवरत बहती नदी कागज़ पर

मरते, बीमार, असहाय, सहमें
लोगों का दुःख भी उनके जाने बिना ही
दुबका है किताबों में
बताता है बड़े लोगों राजपुरुषों को
देखो मैं ऐसा हूं उन अभागे लोगों के बीच

विरक्ति भी, भाव भी, प्रेम भी
अपने हर संभव कोण में
ढल चुके हैं अक्षरों में
कभी-कभी तो मन भी हार जाता है
इतने व्यवस्थित किताबी सुख-दुख से
अनगढ़ा मिट्टी के लौंदे जैसा दुख
और कुछ वैसा ही सुख भी

अब जबकि कम होती जा रही हैं
अनुभूतियां दिन ब दिन,
किताबों में छपने के लिए
नए-नए अक्षर गढ़े जा रहे हैं
समय के छापेखाने में

थोड़े से दिन और हो जाएंगे जब
तब शायद ये सब रह जाएंगे सिर्फ किताबों में!

अक्टूबर 06, 2010

सपने

(17 साल पहले लिखी कवितानुमा कोई चीज़! फटती-उधड़ती बचपन की डायरी के अलग हो गए पन्ने पर लिखी इन पंक्तियों को अस्तित्वहीन होने से बचाने के लिए यहां डालने का लोभ रोका नहीं गया)

आंखों के पथरा जाने से बेहतर है
उनका आंसुओं से भरे रहना,
जिन्हें बहाया जा सके रोकर
ताकि उसके बाद जगह हो
आंखों में, उम्मीदों के लिए
सपने बसने चाहिए आंखों में, हाथों में
सपनों को बुन कर मत खो जाने दो
दिमाग की पेंचिदा गलियों में
भटकने के लिए
सपने बनते हैं हकीकत, अगर
कुचले न जाएं सपनों के ही बोझ से
सपनों को सींचना पड़ता है उम्मीद से
वरना हवा में तैरते सपने अक्सर
बदल देते हैं अपना खुशनुमा रंग
जिंदगी से भागते बदनुमा रंगों से
मत डूबो सपनों में
पलने दो, बढ़ने दो
फलने दो सपनों को
आंखों में, हाथों में।

सितंबर 29, 2010

घर की बातें!!

पिछले कुछ समय से मुझे 'बच्चों की परवरिश कैसे की जाए' इस विषय पर किताबें उपहार में मिलने लगी हैं, कुछ लोग किसी वेबसाइट का पता बताते हैं तो कोई कुछ और। सोशल नेटवर्किंग साइट पर भी यह मुद्दा खासा चर्चा में रहता है। खासतौर पर लड़कियों को कैसे पाला जाए कि वह बिगड़े नहीं, इस बारे में मेरी पिछले दिनों कई मांओं के साथ बातचीत हुई और अधिकांश मामलों में बच्चों को ले कर मां-बाप काफी हद तक परेशान थे। इन सब के बीच मैं यह सोच रही हूं कि जब हम भाई-बहन बड़े हो रहे थे तो अम्मा-पापा की भी तो इन्ही परेशानियों से दो-चार होना पड़ा होगा। और मुझे याद आए दो-चार ऐसे वाकये जो मेरी सीधी-साधी, कम पढ़ी-लिखी लेकिन बहुत ही व्यवहार-कुशल मां और रोबदार से दिखते लेकिन बहुत नरमदिल मेरे पापा की ज़बरदस्त 'parenting skills" को दिखाते हैं।

मुझे हमेशा यह सोच कर हैरत होती है कि आजकल तमाम सुख-सुविधाओं के बीच एक या दो बच्चों को पालने में दिक्कत होती है तब अम्मा के लिए हम पांचों को पाल पाना कितना मुश्किल रहा होगा। जब रसोई में गैस जैसी साधारण सुविधा भी नहीं थी।
बहरहाल, बात हो रही थी उनकी ‘parenting skills’ की तो सबसे पहली बात मुझे जो याद आ रही है वो मेरी किताबें पढ़ने की आदत की है। हां, पढ़ने का चस्का लगाने के पीछे भी मेरे पापा का ही हाथ था। हम तब देहरादून में रहते थे और मैं मुश्किल से पहली या दूसरी कक्षा में पढ़ती थी। तभी से पापा मेरे लिए नंदन, चंपक और चंदामामा किताबें लाते थे। पापा की तनखा मामूली सी थी हालांकि वह बहुत कमाऊ विभाग में थे लेकिन उनके बहुत ही धर्मभीरू किस्म के होने के चलते हमारी आर्थिक दशा में उससे कभी कोई फर्क नहीं पड़ा। सो बंधी-बंधाई तनखा, किराए का मकान, घर में लगे रहने वाली रिश्तेदारों की भीड़ के बावजूद किताबों के लिए खर्च करने में उन्होंने कभी कोई कोताही नहीं की। साथ ही धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान भी लगा हुआ था। नया-नया पढ़ना सीखने के कारण मेरे हाथ जो लगता था उसे ही पढ़ने की कोशिश करती थी। फिर एक दिन एक रिश्तेदार के घर रखी किताबें टटोलते हुए सबसे पहले एक घटिया चलताऊ किस्म का उपन्यास पढ़ा और फिर जैसे उस तरह की किताबें पढ़ने का चस्का लग गया। तब मैं केवल तीसरी या चौथी कक्षा में थी।

तब उपन्यास पढ़ना गंदी बात समझी जाती थी ज़ाहिरी तौर पर जिस तरह के उपन्यास मैं पढ़ने लगी थी वह घटिया थे, विशेषकर उस उम्र के लिए। यह बात मुझे भी पता थी इसलिए ये उपन्यास सबसे छुप कर पढ़े जाते थे। एक दिन अम्मा ने पाया कि मैं जून की झुलसती गर्मीं में छत की सीढ़ियों में छिप कर उपन्यास पढ़ रही हूं। अम्मा ने किताब की बाबत एक शब्द भी नहीं कहा जबकि यूं रंगे-हाथों पकड़े जाने से मेरी जान सूख गई थी। उसी शाम पापा ने मुझे बुला कर पूछा कि मैं क्या पढ़ रही हूं और कहां से लाई वगैरह-वगैरह। आमतौर पर डांट-डपट करने वाले पापा ने यह सब बहुत शांति से पूछा था और कहा कि ये किताबें तुम्हारे लायक नहीं है, इन्हें मत पढ़ा करो। कुछ दिनों बाद ही पापा मेरे लिए एक उपन्यास लाए शिवानी की लिखी भैरवी मुझे वह पढ़ कर बहुत मज़ा आया क्योंकि पता नहीं क्यों बच्चों की कहानियां मुझे बहुत बचकानी लगती थीं, जब मैं बच्ची थी तब भी। इसलिए मेरे लिए यह किताब चुनना पापा की समझदारी ही दिखाता है। उसके बाद नियमित अंतराल के बाद मुझे साहित्यिक उपन्यास, रादुका से प्रकाशित रूसी साहित्य की किताबें मिलती रहीं और बाज़ारू किस्म के उपन्यासों से मेरा मन कब उचाट हुआ मुझे पता ही नहीं चला।


अभी मैं इस पूरी स्थिति का आंकलन करती हूं तो मैं आश्चर्य करती हूं कि कितनी सहजता से मुझे अहसास कराए बिना मेरी पढ़ने की आदत को एक सही दिशा दिखा थी। वो भी तब जबकि साहित्य वगैरह के बारे में उनका रुझान ज़्यादा नहीं था। जितना मैं खुद को जानती हूं मुझे पूरा यकींन है कि अगर तब मुझे डांट कर मना किया जाता तो मैं और भी घटिया किताबों को पढ़ने के लिए चुन कर उनके खिलाफ अपना विद्रोह ज़ाहिर कर सकती थी।


हम तीन बहनें थी, एक खास उम्र के बाद यह बात मोहल्ले वालों की नज़रों को और चौकस बना देती है और गली-मोहल्ले के शोहदों को और सक्रिय। हम लोग छोटे शहरों की अच्छी लड़कियों के लिए निर्धारित सभी नियमों का पूरी तरह से पालन करती थीं। हमेशा सिर झुका कर चलना, शोहदों के फिकरों को सुन कर भी अनसुनी कर निकल जाना और कुछ भी हो जाए सार्वजनिक जगहों पर लड़कों से बातें न करना। ऐसा किसी ने हमें कहा नहीं था लेकिन पता नहीं कैसे ये कायदे-कानून हर बड़ी हो रही लड़की को पता होते थे, क्योंकि बिगड़ी लड़की का तमगा मिलना बहुत ही आसान होता था जिससे सब डरती थीं। मैं इतना ज़्यादा डरी रहती थी कि कभी किसी से बात करनी पड़ जाए तो मैं डर से हकलाने लगती थी और चेहरे की सारी नसें तन जाती थी। यह एक तरह का फोबिया था। ऐसे हालातों में घर के अंदर रहना ही सबसे अच्छा विकल्प होता था, असर यह हुआ कि मैं तो पूरी तरह घरघुस्सु हो गई थी। मुहल्ले में एक-दो सहेलियों को छोड़ कर और किसी के घर जाने की कभी हिम्मत ही नहीं होती थी।
हमारे पड़ोस में एक परिवार रहता था जिसमें मुझसे कुछ बड़ी उम्र के तीन भाई थे ज़ाहिरी तौर पर इसलिए उस घर में जाने का तो सवाल ही नहीं था। एक बार दीवाली में उनके किसी करीबी रिश्तेदार की मौत होने के चलते त्यौहार नहीं मनाया जा रहा था। चूंकि उन दिनों मोहल्ले के रिश्ते काफी करीबी हुआ करते थे तो अम्मा ने उनके लिए भी गुझिया बना डाली ताकि बेचारे बच्चे तो त्यौहार के दिन मिठाई से वंचित न रहें। गुझिया पहुंचाने की जिम्मेदारी मुझे दी गई, क्योंकि अंम्मा और पापा ही लड़कों को ले कर मेरे अंदर बैठे इस डर से पूरी तरह से नावाकिफ थे तो उन्हें बहुत गुस्सा आया जब मैंने कहा कि मैं नहीं जाउंगी वहां। पापा ने कहा कि ये तो तुम्हें ही दे कर आने होंगे। अब एक तरफ वो फोबिया था दूसरी तरफ पापा से डांट खाने का डर। मैं किसी तरह घसीटते हुए बिल्कुल अपने घर से जुड़े उनके घर के गेट तक तो पहुंच गई लेकिन उन्हें आवाज़ देने या गेट खटखटाने की हिम्मत ही नहीं हुई। हाथ-पैर जैसे जम से गए थे, मैं वापस आ गई और रोने लगी। पापा ने पूछा क्या बात है? मैंने कहा कि मुझे वहां जाने में डर लग रहा है। और पता नहीं पापा क्या और कैसे समझे उन्होंने मुझसे कहा कि, “बेटा ऐसे डर के ज़िंदगी थोड़ी चलेगी। जा कर दे कर आओ।"


हालांकि उन्होंने इसके अलावा कुछ भी नहीं कहा लेकिन पता नहीं मुझे इतनी हिम्मत कैसे आई। मैं सीधे गई, गेट पर आंटी को आवाज़ लगाई जिसे सुन कर उनका बेटा बाहर आया और मैंने उसे मिठाई पकड़ा दी। वो लड़का स्कूल में मुझसे एक क्लास आगे था। उन्हीं दिनों तिमाही या छमाहीं परीक्षा के परिणाम निकले थे। वो लड़का अपनी क्लास में और मैं अपनी क्लास में प्रथम आए थे। जब मैंने उसे मिठाई दी तो उसने बहुत ही सहजता से पूछा, "तेरे गणित में कितने नंबर हैं?" मैंने बिना हकलाए या झेंपे उसे अपने नंबर बताए और फिर हमने थोड़ी देर ऐसी ही कुछ और बातें की और मैं वापस आ गई। "चमत्कार!! इतना आसान था इस फोबिया से बाहर निकलना…!!"


मैं सोच कर हैरान रह जाती हूं कि पापा ने कभी पेरेंटिंग पर या वैसे भी कोई बहुत ज़्यादा किताबें नहीं पढ़ी उसके बावजूद वो कितनी अच्छी तरह समझ गए मेरी परेशानी और उसका उपाय। आज मैं सबसे बहुत खुल कर बातचीत कर लेती हूं, अपरिचितों के साथ आसानी से दोस्ती कर लेती हूं तो इसका श्रेय निसंदेह मेरे पापा की parenting skills को जाता है।


हमारे कस्बे में नए-नए खुले डिग्री कॉलेज में क्योंकि विज्ञान की कक्षाएं नहीं थीं इसलिए बारहवीं के बाद पढ़ने के लिए नैनीताल गई। मेरे कुछ रिश्तेदारों ने इस फैसले का बहुत विरोध किया कि पांच बच्चों का खर्च उठाना है, वैसे भी दो-चार साल बाद लड़की को शादी करके विदा करो...हॉस्टल में डाल कर क्यों पैसे खर्च करते हो। पापा आर्थिक से ज़्यादा इस बात को सोच कर मेरे नैनीताल जाने के पक्ष में नहीं थे कि वो मेरे बिना कैसे रहेंगे। लेकिन इस बार झंडा मेरी मां ने उठा लिया था कि मेरी लड़की पढ़ने के लिए नैनीताल ही जाएगी किसी रिश्तेदार के घर पर रह कर नहीं पढ़ेगी। दरअसल मेरी मां को उनके सख्तमिजाज़ दादा जी की वजह से ही बहुत जल्दी ही स्कूल छोड़ कर घर के कामकाज में लग जाना पड़ा था इसलिए पढ़ने की साध वह अपनी लड़कियों के जरिए पूरा करना चाहती थी।

इस तरह आगे की पढ़ाई के लिए पांच साल नैनीताल रहना हुआ जहां बहुत सारे दोस्त बने, खासतौर पर युगमंच के साथ सक्रियता के दिनों में। छुट्टियों में दोस्तों की चिट्ठियां आती थी जिसमें कभी-कभार किसी लड़के की भी होती थी। जिनके बारे में बिना किसी हिचक के अम्मा-पापा को बताती थी। स्कूल के दिनों में जहां मेरी क्लास की दूसरी लड़कियों को स्काउट-गाइड के कैंप वगैरह में जाने के लिए घर में मिन्नतें करनी पड़ती थीं। हमारे घर में इसके लिए कभी रोक-टोक नहीं हुई, बल्कि हर कैंप में जाने, वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। हमारे घर में दोस्तों का निस्संकोच आना-जाना होता था जिसके बारे में मेरे घर वालों को कोई परेशानी नहीं होती थी लेकिन कुछ पड़ोसियों के माथे पर बल पड़ते थे। शायद एक दिन अम्मा ने कहीं कुछ सुन लिया तो वह कुछ परेशान थी और उन्होंने इस बाबत कुछ चिंता ज़ाहिर की थी लेकिन पापा ने एक टूक कहा कि, “मैं चाहता हूं कि मेरे बच्चे बिना किसी कुंठा के रहें, अगर किसी को इससे किसी को दिक्कत है तो हम क्या कर सकते हैं। " मैं उनकी बात अब तक नहीं भूली।


मैं जानती हूं कि मेरे पापा विचारों के मामले में बहुत आधुनिक नहीं हैं लेकिन उस समय उनकी यह बात सुन कर मुझे गर्व हुआ और मैंने हमेशा कोशिश की कि मेरे किसी भी काम से पापा के इस विश्वास को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए। जब मैंने एक अलग धर्म के लड़के से शादी करने का फैसला किया तब भी पापा को मेरे चुनाव पर तो भरोसा था लेकिन शुरुआत में उनकी बहुत ही हल्की सी आनाकानी के पीछे वजह वजह थी कि उन्हें यही नहीं पता था कि लड़का कुछ कमाता-धमाता भी है या नहीं। एक पिता के तौर पर उनकी चिंता बहुत स्वाभाविक थी लेकिन एक बहुत ही संकीर्ण विचारधारा वाले और बहुत कम दुनिया देखे हमारे संयुक्त परिवार के दबाव के बावजूद अम्मा-पापा ने जिस सहजता से मेरे फैसले का समर्थन किया वह अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम था उनके स्तर पर। इसके लिए मैं हमेशा उनकी आभारी रहूंगी।


एक किस्सा और याद आ रहा है वह दिल्ली के दिनों का है। नैनीताल में युगमंच के दौरान दोस्तों के साथ बेबाक हंसी-मज़ाक की आदत पड़ी होने के चलते मैं हर किसी के साथ बहुत सहजता से बात कर लेती थी। लेकिन हिंदी अखबारों का माहौल थियेटर से बहुत अलग होता है, यह बात मुझे तब समझ आई जब कई सारे दोस्तों ने मेरी हंसी-मज़ाक के कुछ और ही मतलब निकालने शुरू कर दिये। खैर, एक महाशय थे जिन्हें मैं बहुत ही परिपक्व और बहुत खुले दिमाग वाला दोस्त समझती थी। तो एक छुट्टी में मैं जब अपने घर आई थी तो उन महाशय ने कहीं से मेरे घर का फोन नंबर पता कर लिया और एक दिन उनका फोन आ गया। मुझे इस बात पर इतना गुस्सा आया कि उधर से कही जा रही बात सुने बिना मैंने जो जी में आया डांटने के बाद फोन रख दिया। यह सब अम्मा-पापा के सामने हुआ। दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला। अगले दिन अम्मा ने कहा, "तूने उसकी बात तो सुनी ही नहीं, बिना सुने इस तरह किसी को इस तरह उल्टा-सीधा बोलना अच्छी बात नहीं है।" मैंने कहा, “तुझे कुछ पता नहीं अम्मा, लोग कैसे-कैसे होते हैं।" अम्मा ने कहा, "हो सकता है कि तू उसे मुझसे अच्छी तरह जानती है, लेकिन अगर उसकी बात सुन लेती तो शायद तू उसे और अच्छी तरह से जान जाती चाहे उसकी बुराई ही सही! कभी भी किसी का अपमान नहीं करना चाहिए, ऐसे में तो कोई भी तेरा दुश्मन बन जाएगा। तुझे उससे बात नहीं करनी थी उसे सीधे शब्दों में कहती तो वह समझ भी जाता और उसे बुरा भी नहीं लगता। किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिए!"

सच कहूं तो मैं हतप्रभ रह गई थी अम्मा की वह बात सुन कर। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरी कम पढ़ी-लिखी मां दुनियादारी के साथ मानव मन की बातों को इतनी अच्छी तरह से समझती है। सामान्य तौर पर उसे खुश होना चाहिए कि मैंने किसी लड़के को उसकी "गलत हरकत" के लिए इस तरह से डांटा, लेकिन उसने मेरी खामी को देखा और समझाया। बाद में इस तरह की परिस्थितियों से निपटने के लिए मैं अम्मा का सुझाया रास्ता ही अपनाती थी, जिसका परिणाम यह हुआ कि इस तरह की पहल करने वाले कुछ दोस्तों के साथ बिना कोई कड़वाहट के बाद में भी अच्छी बोलचाल वाले रिश्ते बने रहे। क्या कहूं इसे? कुछ और या अम्मा की parenting skills!! :-)

ऐसा नहीं है कि अम्मा-पापा बिल्कुल आदर्श अभिभावक थे। हो सकता है कि उनकी जिन बातों से मुझे नई समझ मिली, उन्हें बिना उसके मनोवैज्ञानिक परिणामों के बारे में जाने बिना बस अपनी सहज बुद्धि के आधार पर कहा गया हो। कई बातों को ले कर मेरी उनसे लड़ाइयां होती थी। पापा से अब तक होती हैं, लेकिन बहुत सारे मामलों में वो अपने समय से आगे के साबित हुए हैं खास कर हमारी जैसी सामाजिक-पारिवारिक परिस्थितियों में और उसके लिए मुझे उन पर बहुत गर्व है। हम सभी भाई-बहनों ने बहुत ही सहज, खुशनुमा बचपन बिताया और सब आत्मनिर्भर और अपनी स्वतंत्र सोच वाले हैं तो इसके पीछे अम्मा-पापा की कर्मठ और जिम्मेदार अभिभावक की भूमिका का भी हाथ है। हम सब भाई-बहनों के पास ऐसे ही कोई न कोई किस्से हैं जिन्हें अब, जब हम खुद मां-बाप बन चुके हैं, बहुत शिद्दत से याद करते हैं।

सितंबर 26, 2010

राग और जोश

अभी-अभी एक बहुत ही दिलचस्प किताब पढ़ कर खत्म की है। शीला धर की लिखी इस किताब का नाम है 'raga'n josh'। पढ़ने में इतना मज़ा आया कि बस मन किया इसे अपनी ऑनलाइन डायरी यानी इस ब्लॉग में दर्ज़ कर लिया जाए। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की जानी-मानी गायिका शीला धर ने अपनी इस प्यारी सी किताब में संगीत की बड़ी-बड़ी शख्सियतों से इतनी आत्मीयता से अपने पाठकों से मिलवाया है कि लगता है आप उनसे सचमुच मिल चुके हैं। शीला जी एक गायिका होने के साथ-साथ एक उच्च पदासीन अधिकारी की पत्नी भी थी और खुद कई सालों तक प्रकाशन विभाग में संपादक की सरकारी नौकरी में रहीं। वह दिल्ली के पुराने संभ्रांत माथुर परिवार में पैदा हुई थीं, एक खानदानी कायस्थ परिवार की परंपराओं की रोचक बानगियां भी इस किताब में है।


'raga'n josh' पढ़ते हुए लगता है कि जैसे घर भर के लोग किसी सर्द रात में गर्म रज़ाइयों में घुस कर किसी हंसोड़ मौसी या बुआ से पुराने किस्से सुन रहे हों। शीला धर का हास्यबोध इतने गज़ब का है कि कई बार आप हंस-हंस कर लोटपोट हो जाते हैं। कम से कम मुझे तो याद नहीं कि पिछली बार किस किताब को पढ़ कर मैं इतना हंसी होऊंगी। इससे यह मत मान लीजिएगा कि यह कोई हल्की-फुल्की मज़ाकिया किताब है, ऐसा बिल्कुल नहीं है। दरअसल यह किताब दो हिस्सों में हैं। पहला "Here's is someone I'd like you to meet" में उन्होंने दिल्ली के नंबर सेवन सिविल लांइस पते वाले घर में बीते अपने बचपन की बातों को याद करने के साथ-साथ संगीत की दुनिया के दिग्गजों के बारे में इतनी दिलचस्प बातें बताईं हैं जो कोई उन्हें बहुत करीब से जानने वाला ही बता सकता है। उन बातों को जानने में ऐसा ही रस मिलता है जो अक्सर घरों में एक-दूसरे के बारे में होने वाली गुप-चुप खुसफुसाहटों में मिलता है।



शीला जी की बातों की इस महफिल में कोई छोटे-मोटे लोग नहीं बल्कि खुद बड़े गुलाम अली खान, बुंदु खान, प्राण नाथ, बेगम अख्तर, सिद्देश्वरी, केसर बाई केरकर , भीमसेन जोशी और उनके उस्ताद फैयाज़ अहमद खान जैसे लोग शामिल हैं। शास्त्रीय संगीत का ककहरा भी जानने वाले लोग इन नामों का वज़न जानते हैं लेकिन शीला जी की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि उनकी बातों में ये सारे लोग अपने ईश्वरीय बढ़प्पन के साथ नहीं बल्कि पूरी मानवीय विशेषताओं के साथ आते हैं जो कभी उन्हें बहुत खास तो कहीं बिल्कुल आम लोगों जैसा बनाती हैं। जहां उनकी कमियां सामने आती हैं तो वो भी उन्हें किसी तरह से कमतर नहीं बल्कि और भी मानवीय बनाती हैं। इस जटिल सी बात को शीला जी इतनी प्यारी तरह से लिखती हैं कि पाठक को दाद देनी ही पड़ती है।


बचपन के अपने पारिवारिक जीवन के बारे में बताते हुए वह न केवल अपनी मां के दुखद दांपत्य जीवन का जिक्र करती हैं बल्कि एक तरीके से भारतीय घरों में औरतों की बंधनपूर्ण जीवन का खाका भी खींचती हैं। उनके जीवन में एक पिता हैं जो अपनी पत्नी को मामूली नैन-नक्श होने के चलते न केवल नापसंद करते हैं बल्कि कुछ हद तक क्रूरता भरा व्यवहार भी करते हैं और यह बात उनके तीनों बच्चे समझते हैं और दुखी होते हैं। पिता की बेरुखी की वजह से खाते-पीते संयुक्त परिवार में मां और बच्चों के साथ होने वाले उपेक्षा भरे व्यवहार को शीला जी समझती है और उसकी सामाजिक मनोवैज्ञानिक स्तर पर व्याख्या भी करती हैं। लेकिन इन्ही पिता का एक और रूप भी है जो संगीत की दुनिया में शीला जी के आगे बढ़ने की वजह भी बनता है। उनके पिता संगीत के न केवल अच्छे जानकार थे बल्कि उन्होंने अपनी युवावस्था में प्रसिद्ध विष्नु दिगंबर पलुस्कर जी से संगीत सीखा भी था। वह उन दिनों होने वाले प्रमुख संगीत उत्सवों के आयोजनों में पूरी सक्रियता से हर तरह का सहयोग देते थे। दिल्ली के कई संगीत और डांस संस्थाओं के लिए वह एक मजबूत स्तंम्भ थे। उन्होंने अपना घर संगीतज्ञों के लिए खुला छोड़ा था जिससे उस दौर के लगभग सभी बड़े कलाकार उनके यहां आ कर कई-कई दिन तक रहते थे। उन्हीं दिग्गजों की संगत में ही शीला जी ने शास्त्रीय संगीत का हाथ पकड़ा और आगे चल कर संगीत की दुनिया में अपना नाम किया।

बहरहाल अपनी इस किताब में वह बताती हैं बुंदु खान साहब के बारे में जो उनकी बचपन की यादों का अभिन्न हिस्सा रहे। उनकी जादुई सारंगी से उनके परिवार का हर उत्सव, हर त्यौहार रौनक रहता था। शीला जी याद करती है उनके भोले-निश्चल से व्यक्तित्व को जो अपनी महानता से पूरी तरह अनभिज्ञ था। एक दिन उनके परिवार ने देखा कि वह फूलों की क्यारी में लेट कर आंखे बंद कर पूरी तन्मयता से सारंगी बजा रहे हैं। पूछने पर वह भोलेपन से जवाब देते हैं कि बसंत का मौसम है इसलिए वह फूलों के लिए बजा रहे हैं।" देश के बंटवारे के बाद बुंदु खान पहले तो पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे लेकिन मजबूरन उन्हें जाना पड़ता है। उनकी भावपूर्ण विदाई का संस्मरण भी यहां है।


फिर बड़े गुलाम अली खान के बारे में लिखते हुए वह बताती हैं कि वह मांसाहारी खाने के कितने बड़े मुरीद थे, एक कार्यक्रम के लिए उनके दिल्ली आने पर उन्हें गलती से एक शाकाहारी घर में ठहरा दिया गया तो उन्होंने किस तरह खुद खाना बनाया और खाने के बाद तय कार्यक्रम से बहुत देर बाद आयोजन स्थल पर पहुंचे। शीला जी ने प्राण नाथ का बहुत आत्मीय विवरण दिया है वह कुछ समय तक उनके गुरु भी रहे थे। कैसे बहुत गरीबी के बाद वह अमेरिका पहुंचे और विदेश में अपना पूरा एक संगीत साम्राज्य उन्होंने तैयार किया यह सब इस किताब में हैं।



बेगम अख्तर और सिद्धेश्वरी दोनों ही उनकी करीबी थीं लेकिन आपस में व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता रखती थी। लेकिन इन दोनों का बहुत ही लाड़ भरा परिचय शीला जी इस किताब में कराती हैं। एक बहुत ही मज़ेदार किस्सा सिद्धेश्वरी देवी की विदेश यात्रा के बारे में है जो बनारस की खांटी देसी महिला थीं।



बेगम अख्तर के बारे में कई रसभरे किस्से इसमें हैं। उनके अख्तरी बाई वाले दिनों से जुड़े रंगीन किस्से का भी इसमें जिक्र है। अपने उस्ताज फैयाज खान की गायकी के बारे में बताने के अलावा वह पाठकों को यह भी बताती हैं कि उनको पतंगे कितनी पसंद थीं। कहीं केसर बाई केरकर का जालंधर के नजदीक हरबल्लभ संगीत महोत्सव का गुणगान और फिर कई सालों बाद खुद शीला जी का इस विशिष्ट संगीत महोत्सव में भाग लेने का अनुभव है। कहीं भीमसेन जोशी की मदहोशी की चर्चा है।



संगीत के अलावा क्योंकि वह एक कामकाजी महिला और एक नौकरशाह की पत्नी भी थी तो उस जिंदगी से जुड़ी कुछ बहुत मज़ेदार यादें भी इस हिस्से में हैं, जिसमें एक में प्रकाशन विभाग में उनके गांधीवादी बॉस मोहन राव की शख्सियत के अलावा सिर्फ फाइलों में होने वाले सरकारी कामकाज पर एक बहुत ही सटीक कटाक्ष है। एक जगह गांधी फिल्म बनाने के सिलसिले में भारत आए रिचर्ड एटनबरो की मोहन राव के घर दक्षिण भारतीय खाने की दावत में हुई बुरी हालत का जिक्र है जहां पाठकों के लिए हंसी रोक पाना मुश्किल है।

उनके पति के दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में नियुक्ति के दौरान विदेशी अर्थशास्त्रियों की पत्नियों का मनोरंजन करने का भार कभी-कभी शीला जी पर भी पड़ जाता था। ऐसे में भारतीय संगीत खासकर कर्नाटक संगीत के बारे में जानने की उत्सुक एक मिसेज हैंडरसन को शीला जी की संगत में क्या कुछ झेलना पड़ता है वह पढ़ कर ही समझ आता है।


शीला जी खुद स्वीकार करती हैं कि वह बहुत बढ़िया मिमिक्री कर लेती थी और अभिनय में उनकी बहुत दिलचस्पी थी। अब चूंकि उन्होंने कैरियर के लिए संगीत का रास्ता चुन लिया था तो अभिनय का अभ्यास वह वास्तविक परिस्थितियों में करती थीं। उनके पति श्रीमती इंदिरा गांधी के निजि सलाहकार थे तो इसलिए उन्हें अक्सर उनके साथ संभ्रांत प्रशासनिक अधिकारियों और सांसदों की पत्नियों के साथ सरकारी समारोहों में जाना होता था जहां का नितांत औपचारिक माहौल शीला जी को कतई रास नहीं आता था। उन निरस समारोहों को वह अपनी अभिनय कला से कम से कम अपने लिए तो बहुत सरस बना लेती थीं। कैसे? यह लंबा किस्सा है जानने के लिए किताब पढ़नी पढ़ेगी।



किताब के दूसरे हिस्से में शास्त्रीय संगीत के विषय में लिखे हुए उनके कुछ लेखों का संकलन है। लेकिन ये केवल तथ्य बताते निरस लेख कतई नहीं हैं बल्कि संगीत की बारिकियों को अपनी खूबसूरत भाषा में पिरो कर लिखी गई दिलचस्प बातें हैं। यहां रागों के रूप, उनकी बनावट, उनके मिजाज़ को ऐसे समझाया गया है जैसे किसी प्रियजन की बात हो रही हो। संगीत का मेरा ज्ञान बहुत ही सतही है उसके बावजूद मुझे ये लेख पढ़ने में बहुत मज़ा आया जो लोग संगीत जानते हैं उनके लिए यह किताब पढ़ना बहुत ही बढ़िया अनुभव होगा, इसका मुझे पूरा विश्वास है।


फिलहाल मैं इतनी प्रभावित कि बहुत कुछ और लिख सकती हूं लेकिन मुझे पता है कि मैं कितना भी लिखूं उसका अंशमात्र रस भी आप तक नहीं पहुंचा सकती। इसलिए संगीत की दुनिया में दिलचस्पी रखने वाले दोस्तों के लिए राय है कि यह किताब जरूर पढ़ें।

जुलाई 13, 2010

हम गरीब हैं लेकिन बहुत सारे!

बहुत साल पहले दिल्ली के अपने शुरुआती दिनों में एक हस्तशिल्प प्रदर्शनी में एक स्टॉल पर टंगा कुर्ता मुझे बहुत पसंद आया था। आमतौर पर खरीदारी से बेज़ारी के बावजूद वह कुर्ता मुझे इतना अच्छा लगा कि मैंने दाम भी पूछ लिए थे। बहरहाल तब कीमत बज़ट से बाहर लगी थी और मैंने वह नहीं खरीदा। लेकिन इतने सालों बाद मुझे यह बात अचानक याद आई और पता नहीं क्यों यह कचोट सी हुई मैंने वह कुर्ता क्यों नहीं खरीदा। दरअसल वह स्टॉल SEWA (Self Employed Women Association) का था। यह बात तो तब मुझे पता थी, लेकिन वह कुर्ता किन औरतों ने किन परिस्थितियों में किन उम्मीदों के साथ तैयार किया होगा इसका अंदाज़ा मुझे हाल ही इला आर. भट्ट की लिखी 'We are poor but so many' पढ़ कर हुआ। इस किताब को पढ़ना मेरे लिए एक अद्भुत अनुभव रहा।


गांधीवादी इला भट्ट ने अति गरीब वर्ग की कामकाजी महिलाओं को सेवा संस्था के रूप में न केवल एक मजबूत संठनात्मक रूप दिया बल्कि उन्हें बेहतर स्थितियों में सम्मानजनक जीवन जीने के अवसर प्रदान किए। किताब की प्रस्तावना में उन्होंने एक बहुत महत्वपूर्ण बात पर जोर दिया है वह यह कि आर्थिक सुधारों के केंद्र में अगर महिलाओं को रखा जाए तो बेहतरीन परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। उनका मूलमंत्र है कि महिलाएं मजबूत और महत्वपूर्ण संगठन खड़ा करने में सक्षम हैं। महिलाएं अपने अनुभवों की मदद से समस्याओं के व्यवहारिक हल निकाल सकती हैं और ऐसा करते हुए वे समाज और पर्यावरण को सकारात्मक रूप से बदलती हैं जो सम्मानजनक, अहिंसक और आत्मनिर्भर है।


महिलाओं की क्षमताओं पर अपने विश्वास को उन्होंने सच साबित करके भी दिखाया। आज देश भर में फैली सेवा से जुड़ी विभिन्न कार्यक्षेत्रों में सक्रिय सात लाख से अधिक महिलाएं न केवल अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रही हैं बल्कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से देश की अर्थव्यवस्था में भी अपना योगदान दे रही हैं। इला जी की यह किताब इन्हीं जीवट महिलाओं की कहानी है। यह वही महिलाएं हैं जिनके काम को सरकारी तंत्र पहले काम का दर्ज़ा देने तक से इनकार करता था। इला जी ने अपने प्रयासों से असंगठित रूप से विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले इन कामों को चिन्हित कर सबसे पहले विशेष रूप से महिला श्रम संगठन बनाया। यह कदम महिला अधिकारों के क्षेत्र में मील का पत्थर है।


अपनी इस किताब में इला जी ने बहुत प्रभावी तरीके से गरीब कामकाजी महिलाओं की आर्थिक सामाजिक परिस्थितियों का वर्णन किया है। सेवा संस्था की शुरुआत अप्रैल 1972 में शहरी क्षेत्र की अति गरीब कामकाजी महिलाओं के बीच हुई, लेकिन उसका कार्य क्षेत्र बाद में ग्रामीण इलाकों में भी फैल गया। आज यह संस्था गुजरात के अलावा बहुत से अन्य राज्यों में सक्रिय है और लाखों महिलाओं को जीने का हौसला और रास्ता दिखा रही है।


'We are poor but so many' पढ़ना कम से कम मेरे लिए एक आंख खोल देने वाला सा अनुभव रहा। इसमें कपड़ा मिलों से कूड़े के रूप में निकलने वाली चिंदियां बीनने, उन चिंदियों को सिल कर कपड़े तैयार करने, कबाड़ बीनने, रेहड़ी लगा कर सब्जी बेचने जैसे श्रमसाध्य काम करने वाली महिलाओं के संघर्षपूर्ण जीवन का चित्रण झकझोर देता है। पेट की आग बुझाने के लिए शहरों की ओर पलायन करने वाले दिहाड़ी मज़दूर परिवार, उनकी महिलाएं, बच्चे किन हालातों में रहते हैं, कैसे एक-एक दिन का जीवन जीने की लड़ाई लड़ते हैं या कच्छ के सूखेपन को कड़ाई के रंगीन धागों से सजाने वाली महिलाओं को घर से निकल कर अपनी कला को बाजार तक पहुंचाने की जद्दोजहद में परिवार के किन दबावों को झेलना पड़ा, उन सब का जीवंत खाका इस किताब में है। रन ऑफ कच्छ के वीरान तटीय इलाके में नमक बनाते परिवारों की आर्थिक जद्दोजहद बहुत साफ तरीके से समझा देती है कि देश की आर्थिक नीतियों में बहुत सारे तबके हाशिए पर ही रह गए हैं। हाशिए पर खड़ी महिला श्रमिकों को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिशों की कहानी है यह किताब।


प्रस्तावना में ही एक और बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू की ओर ध्यान दिलाते हुए इला जी ने सांप्रदायिक दंगों को गरीबों का सबसे बड़ा दुश्मन करार दिया है। अपने अनुभवों के आधार पर उनका मानना है कि किसी भी दूसरे कारणों की तुलना में सांप्रदायिक वैमनस्यता गरीबों पर बहुत बेरहमी से मार करती है। सेवा में काम करने के दौरान इला जी ने इस बात को पूरी शिद्दत से महसूस किया कि दंगों की आंच सबसे ज्यादा सबसे गरीब और कमजोर तबके को जलाती है। जरा कल्पना कीजिए उस महिला के दर्द को जो कई साल की मेहनत के बाद सेवा बैंक से कर्ज़ ले कर रहने के लिए एक छोटा घर बनाती है जो एक ही रात में दंगे की भेंट हो जाता है या उस औरत का दुख जिसकी कमाई का साधन कर्ज़ पर ली गई सिलाई मशीन दंगाइयों की मशाल के हवाले हो जाए। यह सच्ची दुनिया की कहानियां हैं जिन्हें इला जी ने इस किताब के जरिए सुनाने की कोशिश की है।


यह किताब महिलाओं के बीच किए गए उनके कामों का लेखा-जोखा होने के साथ हमारे समाज के जटिल खांचे को समझने के लिए एक बहुत अच्छी अध्ययन सामग्री है। इला जी ने बहुत ही संवेदनशील तरीके से राजनीति, अर्थव्यवस्था और जातिगत भेदभाव में लिपटी हमारी सामाजिक व्यवस्था के ताने-बाने को बहुत पैनेपन के साथ देखा, समझा और फिर कामकाजी गरीब महिलाओं को साथ ले कर उन्हीं के अनुभवों की मदद से आगे बढ़ने के रास्ते बनाए।


आज के दौर में हर कोई माइक्रोफाइनेंस की बात करता है लेकिन इलाजी ने कई साल पहले ही इसकी संभावना को पहचान लिया था और उसी का परिणाम था सेवा बैंक। इस बैंक की स्थापना ने कई मायनो में कई मिथकों को तोड़ा। बिल्कुल निचले आर्थिक तबके की महिलाओं की छोटी-छोटी बचत एक बैंक का मजबूत आधार बन सकती है यह बात ही अपने आप में अनूठी थी। अनिश्चित कमाई वाली महिला श्रमिकों पर भरोसा करके बैंक खोलने जैसा बड़ा कदम उठाना इला जी की मजबूत इच्छाशक्ति को दिखाता है। आर्थिक सलाहकारों ने इस फैसले को बेवकूफी भरा करार दिया था, लेकिन आज सेवा बैंक की सफलता सबके सामने है। सेवा बैंक से ऐसी महिलाओं को कर्ज़ मिलता है जिन्हें मुख्यधारा के बैंक कर्ज़ देना तो दूर आस-पास भी न फटकने दें।


यह किताब हमारे समाज के इतने सारे पहलुओं को छूती हुई निकलती है कि इसे संपूर्णता के साथ ले कर समीक्षा कर पाना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है। इस किताब के बारे में एक समीक्षक का कहना है कि, ' अगर आपको प्रेरणा लेनी है तो यह किताब पढ़िए। अगर आप जानकारी चाहते हैं तो यह किताब पढ़िए और अगर आप गरीबों को संगठित कैसे किया जाए यह जानना चाहते हैं तो यह किताब पढ़िए।' मुझे लगता है कि देश को समझने और उसे बेहतर बनाने की नियत रखने वाले हर जागरूक नागरिक को यह किताब पढ़नी चाहिए।

अप्रैल 13, 2010

बाबूजी तुम क्या-क्या खरीदोगे?

ऐसा कितनी बार होता है जब आप बाजार जाते हैं और किसी आकर्षक चीज पर नजर पड़ते ही उसे खरीद लेते हैं, बिना यह सोचे कि उसकी जरूरत है भी या नहीं? क्या आप भी जानते हैं ऐसे लोगों को जो दुकानों पर सेल यानी कीमतों में तथाकथित छूट की खबर लगते ही लपक लेते हैं खरीददारी करने? त्यौहार के मौकों पर बाजारों और मॉल्स पर उमड़ने वाली उन्मादी भीड़ को देख कर आपको नहीं लगता कि खरीददारी अब एक जरूरत न हो कर शौक बन गई है? बहरहाल, मैं बहुत सारे ऐसे लोगों को जानती हूं जिनके घर अंटे पड़े हैं चीजों से लेकिन उन्हें खरीददारी का ऐसा शौक या कहूं कि रोग है कि वो किसी गलत दुकान में भी घुस जाएं तो भी बिना खरीदे बाहर नहीं निकल सकते। कई लोग हैं जो जब उदास होते हैं तो मन खुश करने के लिए खरीदारी करते हैं और जब खुश होते हैं तो उसे मनाने के लिए खरीदारी करते हैं।


लेकिन क्या आप जानते हैं कि चीजें खरीदने की यह लिप्सा ही हमारे समय की लगभग सारी आर्थिक और सामाजिक समस्याओं की जड़ है? क्या आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि चीजें खरीदने की यह भूख ही हमारी दुनिया से सारी हरियाली खत्म कर रही है, हमारी नदियों को विषैला कर रही हैं? क्या आप सोच भी सकते है कि सामाजिक अन्याय के लिए भी लोगों का यही उपभोक्तावाद जिम्मेदार है। पूंजीपतियों और सर्वहारा के बीच की खाई को और चौड़ा करने, सरकारों को बड़े कॉरपोरेशनों को प्रश्रय देने की प्रवृति के पीछे भी यही कारण है? सुनने में बहुत अतिश्योक्तिपूर्ण और अटपटा सा लग रहा है न? लेकिन अगर आप ऐनी लियोनार्ड की केवल 20 मिनट की फिल्म 'Story of stuff' देखेंगे तो इन सारे असंगत से लगते तथ्यों को आपस में जोड़ कर देख पाना न केवल आसान होगा बल्कि आप सोच में भी पड़ जाते हैं कि इतनी सीधी सी बात आम आदमी के समझ में क्यों नहीं आती।


आज जब मौसमों के रंग-ढंग बदले-बदले से नजर आ रहे हैं तो हर कोई ग्लोबल वॉर्मिंग का रोना रो रहा है लेकिन कोई यह सुनने को तैयार नहीं है कि भाई इसके लिए कहीं न कहीं हम, हमारी जीवन शैली भी जिम्मेदार है। उपभोक्तावाद प्राकृतिक संसाधनों का बुरी तरह से दोहन करता है, इस धरती को प्रदूषित कर रहा है, इंसान में जहर भर रहा है, जीव जातियों को समाप्त कर रहा है, लोगों को गरीबी की ओर धकेल रहा है और इन सबके बीच ग्लोबल वॉर्मिंग का कारण बन रहा है।


उपभोक्ता आज छोटे के बाद बड़ा घर, बड़ी कार, सेलफोन का नया मॉडल या आधुनिकतम फैशन के कपड़े-जूते की भूख से जूझ रहा है। पड़ोसी की समृद्धि की जलन में सारा सुख-चैन भुलाए बैठा यह उपभोक्तावर्ग भला क्यों कर सोचेगा कि ये सारी चीजें दरअसल उसके लिए सुख का नहीं बल्कि दुख का कारण बन रही हैं। शोध के परिणामों पर गौर करें तो पता चलता है कि आज का आदमी भले ही समृद्धि के पैमाने पर बहुत आगे पहुंच गया हो लेकिन सुखी जीवन जीने के मामले में वह अपनी पिछली पीढ़ियों के मुकाबले पीछे होता जा रहा है। The story of stuff का संदेश यही है कि जरूरतों को कम करो और दुनिया को थोड़ा बेहतर बनाने में सहयोग दो।


हालांकि सामाजिक कार्यकर्ता ऐनी लियोनार्ड की 2007 में बनी यह ऐनीमेशन फिल्म पूरी तरह से अमेरिकी उपभोक्तावाद पर कटाक्ष करती है। इसमें दिए गए सारे आंकड़े भी अमेरिकी व्यवस्था पर आधारित हैं लेकिन तथ्य के दृष्टिकोण से यह लगातार बाजारोन्मुख हो रही दुनिया की सारी अर्थव्यवस्थाओं की सच्चाई है। आखिरकार अगर वह कहती हैं कि दुनिया के 80% जंगल खत्म हो चुके हैं या अमेजन में हर मिनट में 2000 पेड़ कट रहे हैं तो यह सारी दुनिया की साझी चिंता है।

इस फिल्म की सबसे दिलचस्प बात यह है कि केवल 20 मिनट में यह बहुत खूबसूरती से और तर्कसंगत तरीके से उपभोक्तावाद का पूरा अर्थशास्त्र समझा देती है। इस फिल्म के लिए ऐनी ने काफी देशों की यात्राएं की, प्रामाणिक तथ्य जुटाने के लिए शोध किए और बहुत गंभीर मुद्दे को बिल्कुल भी बोझिल बनाए बिना एक दिलचस्प ऐनीमेशन फिल्म बना डाली। छोटी फिल्म होने के कारण इसे बच्चों के लिए काफी प्रभावशाली माना गया। हालांकि अमेरिका में इस फिल्म का विरोध भी काफी हुआ, कई स्कूलों में इस फिल्म को प्रतिबंधित भी किया गया।

पूंजीवाद समर्थक लोगों के पास ऐनी की फिल्म का विरोध करने के अपने तर्क हैं जो आंकड़ों के स्तर कर एकाध जगह अगर उन्हें गलत साबित कर भी देते हैं तो उससे पूरी फिल्म की सार्थकता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 20 मिनट की यह फिल्म सात छोटे-छोटे हिस्सों में बंटी हैं जिसमें दिखाया गया है कि हमारी भौतिक जरूरतों को पूरा करने के लिए किस तरह से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन होता है, कैसे चीजों का उत्पादन होता है, कैसे उनका वितरण होता है, कैसे उत्पादों की खपत होती है, और कैसे चीजों से पैदा होने वाले कचरे का निस्तारण होता है। इस ऐनीमेशन फिल्म के जरिए वह बहुत प्रभावशाली ढंग से समझाती हैं कि इस उत्पाद के बनने से ले कर उसके कचरे में तब्दील होने की प्रक्रिया के बीच कितना कुछ नकारात्मक पैदा होता है जो इस दुनिया को बद से बदतर बना रहा है। नई चीजें खरीदने के बाद पुरानी चीज को कचरे में डाल कर हम इस दुनिया को कूड़ाघर में बदलते जा रहे हैं।


इतनी छोटी सी फिल्म का बहुत बड़ी सी समीक्षा करने का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि यह फिल्म और उससे जुड़ी तमाम बातें www.storyofstuff.com पर मौजूद है। फिल्म देखिए और अगली बार जब कोई चीज खरीदने लगें तो सोचिएगा जरूर कि उसकी जरूरत सचमुच है क्या?

जुलाई 20, 2009

एक सफर मंज़िल का

कल रात एक फिल्म देखी "दि डेड पोएट्स सोसायटी" , यह बोर्डिंग में पढ़ रहे कुछ किशोरों और उन्हें कविता पढ़ाने वाले अध्यापक (रोबिन विलियम्स) के बीच के भावनात्मक संबंधों की कहानी है। जी नहीं, यह पोस्ट इस फिल्म के बारे में नहीं है। दरअसल यह फिल्म देख कर मुझे एक और अध्यापक याद आया जो इस फिल्म के अध्यापक की तरह ही न केवल बच्चों का चहेता है बल्कि उनकी प्रेरणा का स्रोत भी है। उनके बारे में मैं बहुत दिनों से लिखना चाह रही थी लेकिन न जाने किन वजहों से लगातार टलता जा रहा था। बहरहाल इस फिल्म ने एक तरह से उकसाने का काम किया इसलिए आज की पोस्ट रवि यानि रवि गुलाटी के नाम।

रवि गुलाटी दिल्ली में कम आयवर्ग के बच्चों के लिए अपने घर में ही मंज़िल नाम से एक स्कूल चलाते हैं। घर का मतलब अगर आश्रय से होता है तो रवि का घर अपने अर्थ को पूरी संपूर्णता के साथ सार्थक करता है। उनकी बहन सोनिया का गर्मजोशी भरा स्वागत, निश्चल हंसी और निरंतर चलने वाली बातें पहली बार आने वालों को भी पुराने दोस्तों का सा सहज बना देती है। फिर आप मिलते हैं ममत्व को नए अर्थों में परिभाषित करती रवि की मां श्रीमति इंदिरा गुलाटी से, जिन्होंने अपनी जिंदगी के पिछले 35-40 साल खास जरूरतों वाले बच्चों को इस कठिन दुनिया में जीने के सबक देने में बिताए हैं। वह अब भी पूरी सक्रियता के साथ जुटी रहती हैं मंज़िल के कोटला मुबारकपुर वाले केंद्र से संचालित होने वाले अपने सेवा कार्यों में।

रवि के बारे में सबसे ज्यादा प्रभावशाली चीज़ है सादगी जो उनके बेपरवाह पहनावे से ले कर समाज व दुनिया के बारे में संजीदा सोच सब में बहुत साफ नज़र आती है। कहीं शब्दों का आडंबर नहीं, कहीं अपने विचारों को सही ठहराने की आक्रमकता नहीं, कोई लाग-लपेट नहीं बस सीधी सच्ची व्यवहारिक बात। वह अमेरिकी साम्राज्यवाद की आलोचना करते हैं बिना उत्तेजित हुए शांति से अपने तर्क देते हुए। कभी गांधी की किसी बात की सार्थकता साबित करेंगे बहुत साधारण लेकिन अकाट्य उदाहरण के साथ। दूसरे की बात को पूरा महत्व देते हुए सुनना उनकी एक और विशेषता है। दोस्तों की मंडली में गिटार के सुरों पर अंग्रेजी गाने गाते-गाते वह उसी तन्मयता के साथ मालवा शैली में कबीर भी गाने लगते हैं।


रवि गुलाटी दिल्ली के धनपतियों के इलाके खान मार्केट में रहते हैं लेकिन उनकी बाबस्तगी पङोस के आलीशान घरों की बजाय उनके सर्वेंट क्वार्टस में रहने वाले नौकरों, धोबियों, साइकिल की दुकान पर काम करने वाले कारीगरों जैसे कम आयवर्ग के लोगों से रही है। सीमित आय में जैसे-तैसे गुज़ारा करके भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला कर बेहतर भविष्य का सपना देखते इन लोगों के सपनों को सच बनाने के लिए रवि ने अपने घर के दरवाजे उन बच्चों के लिए खोल दिए और उसे नाम दिया मंज़िल। हालांकि रवि ने आईआईएम, अहमदाबाद से गुर तो कॉरपोरेट प्रबंधन के सीखे लेकिन मंज़िल में उनकी भूमिका अध्यापक की रही। बच्चों को पढ़ाते हुए उन्हें अहसास हुआ कि हमारे स्कूलों में पढ़ाने के तरीके कितने गलत हैं, वो सिर्फ रटना सिखाते हैं, जानना नहीं। उन्होंने बच्चों को दिलचस्प और सरल तरीके से गणित और अंग्रेजी सिखानी शुरू की।

मंज़िल में 1998 से बच्चों के आने का सिलसिला जो शुरू हुआ वो अब तक जारी है। यहां बच्चे गणित, अंग्रेजी और कंप्यूटर खुद पढ़ते भी हैं और दूसरे बच्चों को पढ़ाते भी हैं। यहां सिर्फ पढ़ाई ही नहीं, गाना- बजाना, थियेटर, कला सब कुछ होता है। यहां के बच्चों का एकम् सत्यम नाम से अपना एक म्यूज़िक बैंड भी है। मंज़िल इन बच्चों के लिए अपना घर है शायद उससे कुछ ज्यादा ही है। यह जगह हमेशा गुलज़ार रहती है उनके शोर से, गीत-संगीत से, बातों से। यह जगह हमेशा युवा उर्जा से भरी रहती है जिसे आप वहां उपस्थित हो कर स्वयं महसूस कर सकते हैं। रवि के इस स्कूल में कोई फीस नहीं ली जाती। हालांकि अनुशासन बनाए रखने के लिए कक्षा में देर से आने पर उन्हें मामूली सा जुर्माना देना पढ़ता है।

अधिकांश किशोरवय के इन बच्चों के साथ रवि का व्यवहार हमउम्र जैसा रहता है जिसके चलते उनमें न केवल आत्मविश्वास बढ़ता है बल्कि उनमें नेतृत्व करने जैसे गुण भी विकसित होते हैं। यहां उनकी कल्पनाशीलता, स्वतंत्र सोच को पूरा सम्मान दिया जाता है। यही वजह है कि अब रवि की गैर-मौज़ूदगी में भी मंज़िल का काम-काज बिना किसी रूकावट के चलता रहता है वो चाहे पढ़ाने का काम हो या थियेटर जैसी कोई गतिविधि। यह किसी भी संस्था के कामकाज का आदर्श तरीका है क्योंकि अक्सर व्यक्तिगत प्रयासों से शुरू हुई कोई मुहिम व्यक्ति केंद्रित ही हो कर रह जाती है।

रवि से जब भी कोई पूछता है तुम लोग क्या सिखाते हो बच्चों को तो उनका जवाब हमेशा यही होता है मंज़िल में आओ, मेरे बच्चों से मिलो। सचमुच मंज़िल के बच्चों से मिल कर पता चलता है कि रवि से उन्हें क्या मिला है मूल्यों के प्रति आस्था, आपसी सहयोग से आगे बढ़ने की प्रवृति और आत्मविश्वास से लबरेज़ इन बच्चों में सबसे अच्छी बात यह लगती है कि ये अपनी गरीब पृष्टभूमि को ले कर बिल्कुल भी शर्मिंदा नहीं हैं। वो जानते हैं उन्हें इस जमीन पर खङे हो कर ही ऊंचाइयां छूनी है और वो कोशिश कर रहे हैं। और एक ईमानदार कोशिश से ज़्यादा चाहिए भी क्या? यही वजह है कि इनमें से बहुत से बच्चे, जो दरअसल अब बङे हो चुके हैं, अपनी-अपनी रुचि के कार्यक्षेत्रों में अच्छा काम कर रहे हैं। रवि के दोस्तों का दायरा काफी बङा है, समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय ये लोग समय-समय पर मंज़िल के बच्चों का मार्गदर्शन करते रहते हैं।

रवि परस्पर संवाद को महत्वपूर्ण मानते हैं इसलिए ये बच्चे रवि भैया से दुनिया-जहान की बातें करते हैं और उन बातों से सीखते हैं कि गरीबी या अंग्रेजी न आना ऐसी कोई चीज़ नहीं हैं जो आगे बढ़ने से रोक पाएं। अंग्रेजी एक भाषा मात्र है जिसे चाहो तो कोशिश करके सीखा जा सकता है। रवि बहुत गर्व से बताते हैं कि मेरे बच्चे अगर कुछ सीखना चाहते हैं तो उसके जानकार के पास पहुंच जाते हैं, अगर कोई सिखाने से मना करता है तो वो किसी दूसरे के पास पहुंच जाते हैं वहां भी सुनवाई न हुई तो फिर अगले के पास पहुंच जाते हैं बिना दिल छोटा किए। वो जानते हैं अगर वो सीखना चाहते हैं तो ऐसे लोग भी हैं जो सिखाना चाहते हैं, इसलिए वो कोशिश करना नहीं छोङते। ये हार न मानने वाली बात रवि का मूलमंत्र है अपने बच्चों के लिए, तो फिर हारने की गुंजाइश है कहां?

रवि को मैं व्यक्तिगत तौर पर जानती हूं और उन्हें जानने वाला हर कोई यह जानता है कि वह कितने निस्वार्थ भाव से यह काम करते हैं। बदले में किसी तरह की पहचान या सम्मान जैसी चीज़ों के बारे में सोचे बिना चुपचाप कुछ जिंदगियों को बेहतर बना रहे रवि जैसे लोग इंसान और इंसानियत की ताकत पर भरोसा बनाए रखते हैं। किशोरावस्था जैसी नाज़ुक उम्र में इन युवा उर्जाओं को सही दिशा दिखाने और उनको आगे बढ़ने में मंज़िल की भूमिका के बारे में और जानना चाहें तो www.manzil.in पर एक नज़र डालना न भूलें।

अप्रैल 11, 2009

...इस दुनिया को बस अब बदलना चाहिए

इतिहास और भूगोल कभी भी न तो मेरे पाठ्यक्रम में शामिल थे न मेरे पसंदीदा विषयों की सूची में, लेकिन अब मुझे लगता है कि ये दोनों महत्वपूर्ण विषय अगर मैंने पढे होते तो समाज के बारे में, दुनिया के बारे में मेरी समझ बहुत बेहतर होती। तब शायद अफगानिस्तान मेरे लिए पाकिस्तान की सीमा से लगा एक मुश्किल भौगोलिक परिस्थितियों वाला, अलकायदा को पनाह देने वाले एक मुसलिम देश के अलावा कुछ और भी होता। तब शायद मैं जान पाती कि वहां पारदर्शी पानी से भरी नदियां भी हैं और लहलहाते खेत भी थे। इतिहास मुझे बताता कि कैसे ताकतवर देश अपनी बादशाहत के लिए किसी दूसरे देश को बरबादी की किस हद तक ले जा सकते हैं। कट्ठरवादिता कैसे मासूम बच्चों को तालिबान बना देती है, मुजाहिदीन बना देती है, जिंदा बम बना देती है यह सब मुझे बेहतर तरह से मालूम हो पाता।


तब शायद मुझे यह बात समझनी ज़्यादा आसान लगती कि किसी भी देश में ज़्यादातर आम लोग होते हैं जो गिने-चुने लोगों की सियासतों के बीच जीते हैं। यह भी पता होता कि वहां कट्ठरपंथियों की दहशत तले भी लङकियां प्यार करती हैं, परिवार बनाती हैं। वहां भी लाल-लाल गालों वाले खूबसूरत बच्चे गलियों में वही खेल खेलते हैं जो सारी दुनिया के सारे बच्चे खेलना जानते हैं। शायद तब ये सोचना ज़्यादा स्वाभाविक लगता कि वहां भी बच्चे मां की आंख का तारा होते हैं और जब वो किसी और की लङाई कि ज़िहाद समझ कर लङते हुए जवान होने से पहले ही मर जाते हैं तो उस मां का दुख दुनियां में किसी भी मां के दुख जैसा होता है।


पिछले दिनों अफगानी लेखक खालिद हुसैनी की दूसरी किताब a Thousand splendid suns पढने के बाद मुझे शिद्धत से इस बात का अहसास हुआ कि अखबारी खबरों से किसी समाज को किसी खास छवि में बांध देना कितना गलत है। पेशे से डॉक्टर खालिद हुसैनी अफगानिस्तान में पैदा हुए और अस्सी के दशक में उनका परिवार शरणार्थी के रूप में अमेरिका जा बसा। दो-ढाई साल पहले उनकी पहली किताब the kite runner पढी थी जो मुझे बहुत अच्छी लगी। यह एक मर्मस्पर्शी कहानी है सत्तर के दशक में काबुल में रहने वाला १२ साल का बिन मां का आमिर अपने प्रभावशाली पिता की नजर में खुद को बहादुर साबित करना चाहता है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर होने वाले पतंगबाजी मुकाबले को जीतना उसका लक्ष्य है। आमिर यह मुकाबला जीत जाता है लेकिन उसी दिन उसके खास दोस्त हसन के साथ हुआ हादसा उसे गहरी आत्मग्लानी से भर देता है। अपनी कमतरी को छिपाने के लिए वह हसन पर चोरी का आरोप लगा कर अपने अहाते में बने नौकरों वाले घर से निकलवा देता है। आगे चल कर दोनों की जिंदगियां क्या मोङ लेती हैं, वो है इस उपन्यास की कहानी। हालांकि आमिर और हसन दोनों में से कोई भी नायक नहीं है, इसका मुख्य पात्र है दिनों दिन बद से बदहाल होता अफगानिस्तान। बदलते राजनीतिक हालत किस तरह से आम आदमियों की जिंदगियों की दशा दिशा कैसे बदलते हैं, इसे एक बहुत ही दिलचस्प कहानी के जरिए कहा गया है the kite runner में।


पिछले दिनों जब मैंने खालिद हुसैनी की A thousand splendid suns पढी तो ज्यादातर हिस्सा डबडबाई आंखों से ही पढा गया। ये बहुत उदास लेकिन बहुत खूबसूरती से लिखी गई किताब है। यहां भी कहानी का मुख्य पात्र अफगानिस्तान ही है। लेकिन यहां औरतों की दुनिया में झांका गया है। इस कहानी में एक मरियम है और एक लैला है। एक अमीर बाप की अवैध संतान है और एक तरक्कीपसंद पिता की लाङली। एक अपने पिता को शर्मिंदगी को छिपाने की मजबूरी में और दूसरी बम विस्फोट में परिवार को खो देने के बाद बने हालातों में एक ही आदमी की बीबी बनती हैं। 15 साल की मरियम से जब राशिद ने शादी की तो उसकी उम्र थी लगभग 45 साल और 27 साल बाद जब उसने दूसरी शादी की तो लैला की उम्र भी 15 ही साल थी। ये अफगानिस्तान की औरतों की बेबसी और उससे मुक्त होने की उनकी कोशिशों की कहानी है।


ये बिल्कुल संयोग ही था कि इस किताब के बाद मैंने जो फिल्म देखने के लिए चुनी वो थी पाकिस्तान के फिल्मकार सोएब मंसूर की 'खुदा के लिए' । संयोग इसलिए कि खालिद हुसैनी की दोनों किताबें और यह फिल्म एक सी नहीं तो काफी मिलती जुलती सी परिस्थितियों की कहानी कहती हैं । फिल्म 'खुदा के लिए' बहुत तर्कसंगत रूप से पाकिस्तान के बारे में आम आदमी की गलतफहमियों को दूर करती है। यह 9/11 के बाद पाकिस्तान के आम तरक्की पसंद मुसलमान की कशमकश को बयान करती एक बढिया फिल्म है । इस फिल्म का सबसे प्रभावशाली हिस्सा वो है जहां ब्रिटेन में रह रहा एक पाकिस्तानी अपने दीन की हिफाज़त के लिए बेटी मरियम को धोखे से पाकिस्तान ले जा कर उसे बिना बताए उसकी शादी कर अफगानिस्तान के एक गांव में छोङ आता है। यह एक रोंगटे खङे कर देने वाला दृश्य है। यह फिल्म इस्लाम के नाम पर फैले बहुत से भ्रमों को बहुत खूबसूरती के साथ दूर करती है।एक खालिद की मरियम है जो कुरान के कुछ अक्षर बांच पाती है और जो दुनिया के बारे में बस उतना ही जानती है जितना बचपन में उसके पिता ने और शादी के बाद उसके पति ने बताया। सोएब मंसूर की मरियम इंग्लैंड में पली बङी आज़ाद खयाल लङकी है। लेकिन विडंबना देखिए कि दोनों के बाप उनकी मर्जी के खिलाफ उनकी जबरन उनकी शादियां करवाते हैं। आखिर क्यों होता है औरतों के साथ ‌ऐसा हर कहीं?

ये दोनों किताबें और यह फिल्म काफी पहले आ चुके हैं लेकिन चूंकि मैंने ये अब पढीं और देखी और मन किया कि लिखूं सो लिख डाला।

मार्च 13, 2009

ये रंग होली के नहीं हैं….


आंखे पहले हाथ में पकङाई गई चीज़ पर नज़र डालती हैं और फिर शर्मिली मुस्कराहट के साथ जब वो मुझे दोबारा देखती हैं तो एक खास किस्म की खुशी से चमक रही होती हैं। लगभग हर बच्चे की प्रतिक्रिया एक सी होती है। हर बार बच्चों की आंखों में वो चमक देख कर मैं सोचती हूं कि इस बार तो अतिमा भाभी को फोन करके एक बहुत बङा वाला धन्यवाद देना है जिनकी वजह से किसी को खुश करने के खुशगवार पल मुझे मयस्सर होते हैं। बच्चों को उल्लास से भर देने वाली वो भेंट होती हैं खूब सारे पेंसिल वाले रंग।


पिछले तीन-चार साल से कम से कम दो सौ बच्चों को रंगीन पेंसिलों के तोहफे मेरे हाथों से बंट चुके हैं। ये वो बच्चे हैं जिनके लिए रंगीन पेंसिलें खरीद पाना मुश्किल नहीं तो आसान भी नहीं हैं। आमतौर पर निम्न आयवर्ग परिवार के इन बच्चों के अभिभावकों के लिए उनके लिए बहुत जरूरी चीजें जुटा पाना भी मुश्किल होता है। कापी-किताब और पेंसिल या पेन मिल जाए वही बहुत है। ऐसे में अच्छी क्वालिटी की भले ही थोङी बहुत इस्तेमाल की हुई बीस-पच्चीस पेंसिल वाले रंगों का तोहफा बच्चों के खास ही होता है।


थोङी बहुत इस्तेमाल की हुई ये पेंसिलें मेरे पास पहुंचती हैं अतिमा भाभी के द्वारा सिंगापुर से। भाभी का पूरा नाम अतिमा जोशी है जो अपने पति नीरज जोशी और एक किशोरवय बेटी नीतिमा के साथ सिंगापुर में रहती हैं और एक स्कूल में पढाती हैं। वहां पढाते हुए उन्होंने देखा कि उनकी क्लास में बच्चे स्टेशनरी का बहुत ही लापरवाही के साथ इस्तेमाल करते हैं। पेन, पेंसिल, रंग, पेंसिल शार्पनर जैसी चीजें थोङे से प्रयोग के बाद फेंक दी जाती हैं।


हिंदुस्तान जैसे देश में मध्यमवर्गीय परिवार में पले-बङे संस्कारी मन से ये बरबादी हजम न होनी थी न हुई। सो उन्होंने बेकार समझ कर फेंक दी गई उन रंगीन पेंसिलों को इकट्ठा करना शुरू किया और अपनी सालाना यात्रा में जब हिंदुस्तान आईं तो रंगों की वो पोटली साथ लाना नहीं भूलीं। अच्छी खासी भर चुकी उस पोटली से कुछ रंग उन्होंने खुद बांटे और कुछ मुझे दे दिए। लगभग तीन साल पहले शुरू हुआ यह सिलसिला तब से बरकरार है।


यहां इस पोस्ट का मकसद किसी को महिमामंडित करना नहीं है बल्कि सिर्फ यह बताना भर है कि थोङी सी सकारात्मक सोच और थोङी सी पहल थोङी सी ही सही लेकिन इतने सारे बच्चों के लिए खुशी का सबब बन गई। बच्चों की दुनिया को रंगीन बनाने के लिए यह छोटी सी पहल भी कितनी महत्वपूर्ण है, हाथ में पेंसिल पकङे बच्चे की उछाह भरी मुस्कान मुझे बहुत अच्छी तरह से बता देती है।

मेरे ब्लॉग पर आने वाले सभी परिचित, अपरिचित मित्रों को होली मुबारक। इस होली में रंग न केवल तन को बल्कि मन और सपनों को भी रंगें।

जनवरी 07, 2009

नए साल के बहाने

'इससे पहले कि बात टल जाए.....' रेडियो पर गुलाम अली ने अपनी दिलकश आवाज़ में गज़ल की शुरूआत जैसे मुझे चेताने के लिए ही की थी। अचानक मुझे याद आया कि नए साल में मेरा खुद से यह वादा है कि नियमित रूप से कुछ न कुछ लिखना जारी रखूंगी। लेकिन हालत देखिए, गुलाम अली साहब ने याद न दिलाया होता तो साल का पहला हफ्ता तो बस यूं ही गुजर जाता। सो इससे पहले कि वक्त टल जाए, कुछ बातें हो ही जाएं।

गया साल जाते-जाते उदासी भरी टीस दे गया, कुछ को आर्थिक तौर पर बरबाद कर गया और अधिकांश को आतंकित करके गया। आम आदमी कुछ दिन चीखने-चिल्लाने, इस-उस को दोष लगाने, कुछ को गरियाने के बाद कलपते दिल पर आने वाले साल के बेहतर होने की उम्मीद का फाहा रख कर शांत बैठ गया। दरअसल उम्मीद चीज़ ही ऐसी है। हम गहरे से गहरा दुख बेहतर कल की उम्मीद के साथ झेल जाते हैं, पल-पल सरकता समय भी हमें बीते वक्त के सुख-दुख को बिसरा आने वाले समय को आशा भरी नजरों से देखने के लिए तैयार करता है। शायद यही वजह है कि हर कोई यह जानते हुए भी कि नया साल बीत चुके बहुत सारे दिनों जैसा ही एक आम दिन है, उसे खास अहमियत देता है, उसका स्वागत करता है।

यहां सोनापानी में हम लोग हर साल 30-31 दिसंबर को कुछ खास तरीके से मनाने की कोशिश करते हैं। इन दिनों यहां बेतरह ठंड होती है। हालांकि दिन में चटखदार धूप खिली होती है लेकिन जहां शाम के चार बजे कि हवा बर्फीली होने लगती है, पाला गिरने के कारण ठंड और मारक होती है। लेकिन जब आप अलाव के आस-पास बैठे दिलकश संगीत का मज़ा ले रहे हों तो यह सर्दी लुत्फ भी उतना ही देती है। इस बार 30 दिसंबर को हमने मुंबई के अरण्य थियेटर ग्रुप के नए नाटक ‘द पार्क’ का प्रिमियर यानी पहला शो किया जो खासा पसंद किया गया। यह नाटक मानव कौल ने लिखा है जो इससे पहले ‘शक्कर के पांच दाने’, ‘पीले स्कूटर वाला आदमी’, ‘बल्ली और शंभू’, ‘इलहाम’ और ‘ऐसा कहते हैं’ जैसे कथ्य की दृष्टि से काफी सशक्त नाटक लिख चुके हैं। मुंबई, दिल्ली के नाटक जगत में उनके नाटक खासे चर्चा में रहते हैं।

उनके नए नाटक ‘द पार्क’ की चर्चा यहां न करके उसका अलग से रिव्यू देने की कोशिश मेरी रहेगी। 31 दिसंबर की शाम संगीत से लबरेज़ थी। यह एक खास तरह का संगीत था। इसमें दरअसल हिंदी के कई सारे हिंदी कवियों की उन कविताओं को गाया गया जिन्हें किसी न किसी नाटक में इस्तेमाल किया गया है। शब्द संगीत नाम से पेश की गई यह प्रस्तुति बहुत ही शानदार रही। अरण्य थियेटर ग्रुप के 14 युवा स्वरों ने जयशंकर प्रसाद, नागार्जुन, निराला के साथ-साथ गोरखपांडे, बल्ली सिंह चीमा जैसे समकालीन कवियों की रचनाएं गाईं। रंगमंचीय संगीत के पुरोधा ब.ब.कारंत की धुन में बंधी प्रसाद की रचना ‘बीती विभावरी’ से जब कार्यक्रम की शुरुआत हुई तो बस समां बंध गया। इसके बाद निराला की ‘बांधों न नाव इस ठांव बंधु’ और ‘बादल छाए, बादल छाए’ गाए गए। ‘बांधों न नाव’ को गोपाल तिवारी की प्यारी सी धुन में गाया गया। श्रोताओं में आठ-दस लोग विदेशी थे जो हिंदी नहीं जानते थे लेकिन गीतों की सुंदर धुनों ने उन्हें इस कदर बांधा कि उन्होंने लगभग तीन घंटे चले इस पूरे कार्यक्रम का पूरा आनंद उठाया। नागार्जुन की रचना ‘पांच पूत भारत माता के’ बच्चों के बीच खास तौर पर पसंद की गई। । गोपाल तिवारी ने अपना एक खूबसूरत गीत ‘रब्बा रोशनी कर तू' पेश किया जो बहुत पसंद किया गया।

नैनीताल वाले हमारे मंटूदा की धुन में बंधे कवि बल्ली सिंह चीमा जी के गीत ‘बर्फ से ढक गया है पहाङी नगर’ को जब गाया गया तो सोनापानी में हमारे साथ काम करने वाले लङके भी साथ-साथ गा रहे थे। दरअसल मुंबई में रहने वाला हमारा दोस्त गोपाल तिवारी सोनापानी की अपनी पिछली यात्राओं के दौरान उन्हें यह गीत याद करा चुका था। यह उन्हें इतना अच्छा लगता है कि अक्सर रसोई से समवेत स्वर में इस गाने की आवाज आती रहती है। अब तक संगीत के नाम पर फिल्मी गीतों को ही जानने वाले इन लङकों को बेहतर संगीत को जानते और उसका आनंद लेते देखना अच्छा लगता है। युवा जोशीली आवाजों पर तैरते गोरखपांडे के गीत ‘समय का पहिया चले रे साथी’ ने माहौल में गर्माहट भर दी। गोरखपांडे का यह गीत समय के बारे में कहता है…।
रात और दिल, पल-पल छिन-छिन आगे बढता जाए
तोङ पुराना नए सिरे से सब कुछ गढता जाए

इस उम्मीद के साथ कि पुराना जो सङ चुका है, अप्रासंगिक हो चुका है टूटेगा उसकी जगह कुछ नया रचा जाएगा जो अच्छा होगा, सच्चा होगा, आप सभी को नया साल मुबारक हो।

अगस्त 14, 2008

रिमझिम बारिश के बीच पहाङी खाना

इन दिनों पहाङ झमाझम बारिश में भीग रहे हैं। हर तरह के पेङ-पौधे अपने सबसे सुंदर हरे रंग को ओढे हुए हैं। बादल आसमान से उतर कर खिङकियों के रास्ते घर में घुसे आ रहे हैं। आप छोटे-छोटे खिङकी-दरवाजों वाले एक पुराने लेकिन आरामदायक घर के अंदर बैठे छत की पटाल (स्लेट) पर लगातार पङ रही बूंदों की टापुर-टुपुर का आनंद ले रहे हों तो इस भीगे-भीगे से मौसम में खाने का ख्याल आना स्वाभाविक ही है। खाने की शौकीन होने के कारण मेरे लिए अच्छा मौसम भी एक बढिया बहाना है कुछ खाने का या कम से कम खाने को याद करने का :)। कभी-कभी मुझे आश्चर्य होता है की पहाङी खाना इतना विविधतापूर्ण, स्वादिष्ट और पौष्टिक होने के बावजूद पहाङ से बाहर लोकप्रिय होने में कामयाब क्यों नहीं रहा ? शायद रंगरूप और नामों का खांटी भदेस होना इसकी एक वजह रही हो।

बहरहाल, आजकल खेतों में अरबी, सेम (beans), शिमला मिर्च, मूली, हरी मिर्च, बैंगन, करेला, तोरी, लौकी, कद्दू, खीरे, टमाटर, राजमा लगा हुआ है। अरबी मेरी पसंदीदा सब्ज़ी है। अरबी को स्थानीय भाषा में पीनालू कहा जाता है और मुझे नहीं लगता कि पहाङ के अलावा कहीं और इसका इतना विविधतापूर्ण इस्तेमाल होता होगा। इसका मुख्य हिस्सा जङ यानि अरबी तो खाई ही जाती है, , इसकी बिल्कुल कमसिन नन्हीं रोल में मुङी पत्तियों को तोङ कर, काट कर सुखा लिया जाता है, जिन्हें गाब या गाबा कहा जाता है। अरबी के के तनों को काट कर सुखा लिया जाता है, जिन्हें नौल कहते हैं। नौल और गाबे की सब्ज़ियों का लुत्फ सर्दियों में उठाया जाता है जब ठंड की वजह से खेतों में सब्ज़ियां बहुत कम होती हैं। इनकी तरी वाली सब्ज़ी चावल के साथ खाई जाती है।

मूली को आमतौर पर सलाद के रूप में खाया जाता है लेकिन कुमाऊंनी खाने में (मोटी जङ वाली मटियाले रंग की पहाङी मूली) यह इतनी गहरी रची-बसी है कि बरसात और जाङों में खाई जाने वाली लगभग सारी सब्ज़ियों चाहे वह राई या लाई की पत्तियां हों या आजकल खेत में हो रही ऊपर लिखी हुई कोई भी सब्ज़ी के साथ मिला कर पकाई जाती है। मूली के साथ इन सब्ज़ियों का मेल बहुत अजीब सा सुनाई देता है न? लेकिन यकींन मानिए खाने में ये लाजवाब होती है। दरअसल पहाङी मूली मैदानी इलाकों में उगने वाली सफेद, सुतवां, नाजुक सी दिखने वाली रसीली मूलियों से न केवल रंगरूप में बल्कि स्वाद में भी बिल्कुल अलग होती हैं। सिर्फ मूली को सिलबट्टे में हल्का सा कुटकुटा कर मेथीदाने से छौंक कर बना कर देखिए, इसे थचुआ मूली कहते है, न कायल हो जाएं स्वाद के तो कहिएगा। मूली को दही के साथ भी बनाया जाता है।


पहाङी जीवन-शैली की तरह ही यहां का खाना भी सादा और आडंबररहित होता है। यही इसकी खासियत भी है। किसी भी सब्ज़ी को किसी के साथ भी मिला कर बनाया जा सकता है, पिछले हफ्ते मैं नैनीताल गई थी, रात को उमा चाची ने मुंगोङी आलू की रसेदार सब्ज़ी के साथ बींस, शिमला मिर्च और मूली की मिली-जुली सब्ज़ी खिलाई, आनंद आ गया। सब्ज़ियों का यह तालमेल केवल एक पहाङी घर में ही बनाया जा सकता है। कुछ सब्ज़ियां मेरे ख्याल से केवल पहाङ में ही होती हैं जैसे गीठी और तीमूल। बेल में लगने वाले गीठी भूरे रंग की आलूनुमा सब्ज़ी होती है जिसे एक खास तरीके से पकाया जाता है। तीमूल को पहले राख के पानी के साथ उबाल लेते हैं और उसके बाद उसे किसी भी अन्य सब्ज़ी की तरह छौंक कर सूखी या तरीवाली सब्ज़ी बना लेते हैं, बहुत ही स्वादिष्ट बनती है। एक और सब्ज़ी होती है पहाङ में जो खूब बनाई-खाई जाती है वो है गडेरी, मैदानी इलाकों के लोग उसे शायद कचालू के नाम से पहचानेंगे। भांग के बीजों को पीस कर उसके पानी को गडेरी के साथ पकाया जाए तो इसका स्वाद कुछ खास ही होता है।

लोकप्रिय पहाङी खानों में भट्ट (काला सोयाबीन) की चुङकानी, जंबू और धुंगार जैसे मसालों से छौंके आलू के गुटके, कापा (बेसन भून कर बनाया गया पालक का साग), दालें पीस कर बनाई गई बेङुआ रोटी इत्यादि शामिल हैं। पहाङी व्यंजनों में डुबकों का अपना खास मुकाम है। यह भट्ट, चना और गहद की दाल से बनते है, डुबके बनाने के लिए दाल को रात भर भिगा कर सुबह पीस लेना होता है और फिर इसे खास तरह का तङका लगा कर हल्की आंच में काफी देर तक पकाया जाता है। इसके अलावा उङद की दाल को पीस कर चैंस बनाई जाती है।

पहाङी खाने में चटनी की खास जगह है, चाहे वह शादी ब्याह में बनने वाली मीठी चटनी सौंठ हो या भांग के बीजों (इनमें नशा नहीं होता, गांजा भांग की पत्तियों से बनाया जाता है) को भून कर पीस कर बनाई गई चटपटी चटनी। इन दिनों पेङों पर दाङिम (छोटा, खट्टा अनार) लगा हुआ है, धनिया और पुदीना के पत्तों के साथ इसकी बहुत स्वादिष्ट चटनी बनती है। पहाङों में बङा नींबू जिसे मैदानी इलाकों में गलगल भी कहा जाता है बहुतायत से होता है। सर्दियों की कुनकुनी धूप में नींबू सान कर खाना एक अद्भभुत अनुभव होता है। इसके लिए नींबू को छील कर इसकी फांकों के छोटे-छोटे टुकङे कर लेते हैं, साथ में मूली को धो-छील कर लंबे पतले टुकङों में काट कर नींबू के साथ ही मिला लेते हैं। भांग के बीजों को तवे पर भून कर सिलबट्टे पर हरी मिर्च और हरी धनिया पत्ती, नमक के साथ पीस लेते हैं। अब इस पीसे हुए भांग के नमक को नींबू और मूली में मिला लेते हैं। अब एक कटोरा दही को इसमें मिला लेते हैं। स्वाद के मुताबिक थोङी सी चीनी अब इसमें मिला लीजिए और सब चीजों को अच्छी तरह से मिला लीजिए। इसके लाजवाब स्वाद के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं खुद जायका ले कर देखें।

इन दिनों यहां खीरे हो रहे हैं, पहाङ में खीरे को ककङी कहा जाता है और यह आमतौर पर मिलने वाले खीरे से आकार में दो-तीन गुना बङा होता है। जब खीरे नरम होते है तो उन्हें हरे नमक यानी धनिया, हरी मिर्च और नमक के पीसे मिश्रण के साथ खाया जाता है। खीरे जब पक जाते हैं तो उनका स्वाद हल्का सा खट्टा हो जाता है अब यह बङियां बनाने के लिए बिल्कुल तैयार है। इसे कद्दूकस करके रात भर भिगाई गई उङद की दाल की पीठी में हल्की सी हल्दी, हींग इत्यादि मिला कर छोटी-छोटी पकौङियों की शक्ल में सुखा लिया जाता है। बाद में आप इसे मनचाहे तरीके से बना सकते हैं।

मुझे खाने का शौक है और खास तौर पर पहाङी खाना बहुत ही ज्यादा पसंद है उसमें भी सबसे ज्यादा पसंद है रस-भात। रस दरअसल बहुत सारी खङी दालों से बनता है। इसके लिए पहाङी राजमा, सूंठ (पहाङ में होने वाली सोयाबीन की एक किस्म), काला और सफेद भट्ट, उङद, छोटा काला चना, गहत इत्यादि दालों को अच्छी तरह से धो कर रात में ही भिगा दिया जाता है। सुबह उसी पानी में मसाले डाल कर चूल्हे की हल्की आंच में काफी देर तक उसे पकाया जाता है जब सारी दालें पक जाती हैं तो पानी को निथार कर अलग कर लिया जाता है। दालों का यही पानी रस कहलाता है जिसे शुद्ध घी में हल्की सी हींग, जम्बू और धूंगार के पहाङी मसालों का तङका लगा कर गरमा-गरम चावलों के साथ खाया जाता है।

फिलहाल इतना ही, फिर किसी और दिन करेंगे चर्चा कुछ और पहाङी व्यंजनों की। बाहर बारिश तेज़ हो गई है।

मई 10, 2008

समय-दो

(...... और यह रहा दूसरा हिस्सा)
समय चुपचाप चहलकदमी करता रहता है
पल-छिन का हिसाब-किताब करते हुए
कभी न रुक सकने की नियति ढोता, बेबस
समय करता है कल्पना घङियों की कैद से मुक्ति की
बाबरा है समय, जाने क्या-क्या सोचता है

लेकिन सोचो तो अगर समय निकल ही जाए
घङियों की कैद से, तो क्या होगा
तब उन बेचारों पर तो बङी बुरी बीतेगी
जो बेहतर कल के सपनों के साथ
जैसे-तैसे काट रहे हैं आज का कठिन दिन
लेकिन उनकी बन आएगी
जिनके पापों का फल मिलना है कल

ऐसे तो उलट-पुलट जाएगा सब कुछ
सोचता है समय
समय महसूस करता है जिम्मेदारी
इसलिए बना रहता है कैद में
मुस्तैदी से करता है पल-छिन का हिसाब

वो शायद कभी जान भी नहीं पाता होगा
कितना डर जाता है कोई
किसी पुराने महल के उजङे, वीरान खंडहर में
चहलकदमी करते हुए
घङियों में कैद समय की ताकत को जान कर

मई 04, 2008

समय 1

(समय पर लिखने की मेरी कोशिश का पहला हिस्सा)
मां शायद कभी न देती
आर्शीवाद खूब बड़े हो जाने का
अगर जान पाती कि
कितनी अकेली हो जाएगी वो तब।

लङकियों की शादी का सपना
संजोते पिता भी अगर जानते होते
उनके विदाई के बाद के
खून तक में चुभने वाले एकाकीपन को
तो शायद सपनों को किसी दूसरे रंग में रंगते।

बेटे की ऊंची नौकरी भी शायद
उनकी प्रार्थनाओं में नहीं होती
अगर पहले से महसूस कर पाते
घर में उनके न होने का दर्द।

कितना कुछ छूट जाता है, कट जाता है
एक परिवार में,
सिर्फ समय के आगे बढ़ जाने से।

कभी शौक से बनवाया चमचमाता नया घर
बीतते वर्षों के साथ पुराना बूढ़ा दिखाई देने लगता है
निर्वासित छूटे घर के दर्द को पीते हैं
अपने बालों की सफेदी और चेहरे की झुर्रियों के साथ
बूढ़े होते मां-बाप धूप में अकेले बैठ कर
अचानक खूब बड़े हो गए घर में
बच्चों की पुरानी छूटी आवाजों को सुनते हुए।

मार्च 20, 2008

आयो नवल बसंत, सखि ऋतुराज कहायो


"नथनी में उलझे रे बाल "......सधे हुए स्वर के आरोह-अवरोह में अठखेलियां करते यह बोल होली गायकी से मेरा पहला परिचय थे। सिर पर गांधी टोपी और अबीर-गुलाल से रंगे सफेद कुरता-पायजामा पहने फागुनी मस्ती में लहक-लहक कर यह होली गाने वाले अपने मौसाजी के बारे में हम सोच भी नहीं सकते थे कि वो इतना बढ़िया गा लेते होंगे। आठ-दस साल की उम्र में तब न तो बोल समझ में आए थे और न हमेशा गंभीर भाव-भंगिमा वाले अपने मौसा जी का वह गायक वाला रूप। उन्हें इतना खुशमिज़ाज शायद मैंने पहली बार देखा था। उनकी वह छवि और होली के वो बोल मेरी स्मृति में हमेशा के लिए अंकित हो गए।

पहाङ में होली का मतलब रंग से अधिक राग से होता है। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि गायन की कई प्रतिभाएं इन्हीं दिनों उभर कर सामने आती हैं। पक्के रागों की धुन से बंधी बंदिशों के रूप में गाई जाने वाली ये होलियां फागुन को संगीत से ऐसा सराबोर करती हैं कि राग-रंग रिस कर गाने वाले और सुनने वालों को असीम तृप्ति के भाव से भर देता है। आमतौर पर पुरूष व महिलाओं की होली बैठकें अलग-अलग होती हैं। पुरूषों की होली बैठकें कभी-कभी रात भर भी चलती रहती हैं और गायकी का जो समां बंधता है वह सुनने लायक होता है। कभी राधा की यह शिकायत कि "मलत-मलत नैना लाल भए, किन्ने डालो नयन में गुलाल ...."अलग- अलग होल्यारों के स्वरों में रागों का जादू बिखेरती है तो कभी किसी गोपी की ये परेशानी कि जल कैसे भरूं जमुना गहरी महफिल को गुंजायमान करती है। शास्त्रीय संगीत के प्रति मेरे शुरुआती ग्यान और रूझान की वजह होली की यही बैठकें रहीं।

दो दिन पहले ही लाल किनारी वाली सफेद धोती और माथे पर अबीर-गुलाल का टीका लगाए होली बैठकों में जाती औरतों के झुंड को देख कर बचपन की होली याद आई और बेतरह याद आई अम्मा यानी मेरी मां। अम्मा का सबसे पसंदीदा त्यौहार था होली, मोहल्ले-पङोस की मानी हुई होल्यार (होली गाने वाली) जो ठहरी। कुमाऊं में होली एक दिन का त्यौहार न हो कर लगभग पूरे महीने चलने वाला राग-रंग का उत्सव होता है। होली से पहले पङने वाली एकादशी को रंग पङता और शुरू होता है महिलाओं की होली बैठकों का दौर।

बचपन में अम्मां के साथ इन बैठकों में जाने का लालच होता था वहां मिलने वाले जंबू से छौंके चटपटे आलू के गुटके, खोयेदार गुझिया और चिप्स-पापङ। बङे होने के साथ धीरे-धीरे गाई जाने वाली होलियों के बोल, धुन भी मन में उतरने लगे। ढोलक और मंजीरे के साथ जब सिद्धि के दाता विघ्न विनाशक होली खेले मथुरापति नंदन के गायन से होली का शुभारंभ होता तो मन में एक अजीब सी पुलक सी जगती थी। यह पुलक या उछाह होली में एक नया ही रंग भर देता था जिसे अनुभव ही किया जा सकता है शब्दों में समझा पाना मेरे लिए तो संभव नहीं है।

जैसे ही हवा में फागुन के आने की गमक सुनाई देने लगती अम्मा अपनी भजनों और होली की डायरी निकाल लेती। हर होली की बैठक से लौटने के बाद डायरी और समृद्ध होती थी नऐ गीतों से। अस्थमा की वजह से साल-दर-साल मुश्किल होती जाती सर्दियों की पीङा झेलने के बाद होली मानों नई जान डाल देती थी अम्मा में। होली उसकी आत्मा तक में जुङी थी शायद इसलिए इस संसार से जाने के लिए उसने समय भी यही चुना। आज से ठीक पांच साल पहले होली के दिन मेरी मां ने इस दुनिया से विदा ली। होली मेरा भी सबसे पसंदीदा त्यौहार है खासतौर से इसकी गायकी वाला हिस्सा, लेकिन अम्मा के जाने के बाद न जाने क्यों होली आते ही मन कच्चा सा हो जाता है और अबीर-गुलाल का टीका लगाऐ होली बैठकों में जाती औरतों को देख कर आंख पनीली हो आती हैं।
(ये फोटो युगमंच वाले प्रदीपदा ने भेजी है ब्लाग पर लगाने के लिए। धन्यवाद प्रदीप दा।)

फ़रवरी 06, 2008

फुरसत ही नहीं मिलती

आज बहुत दिनों के बाद ब्लाग की दुनिया में वापसी हो रही है बहुत अच्छा लग रहा है। इस बीच कबाङखाने में बहुत से महत्वपूर्ण लोगों की आमद से लगता है कबाङ का धंधा काफी मुनाफे का चल रहा है। बहरहाल, जैसा कि आप में से ज्यादातर लोग जानते हैं कि इस बीच मैं एक बालक की भी मां बन गई हूं और यकीन जानिए दो बच्चों को संभालना बिल्कुल भी आसान काम नहीं है। इसलिए ब्लाग लिखना तो छोङिए अखबार की सुर्खियां तक पढ पाना मुहाल हो गया है। थोङी सी मोहलत मिली तो सोचा एक चक्कर यहां का लगा आऊं। अभी तो फिलहाल उम्मीद ही कर रही हूं कि शायद एक आध महीने मे स्थिति नियंत्रण में आ जाएगी और कुछ लिखने का मौका मिलेगा। कबाङखाना में पुत्रजन्म की सूचना पर कई मित्रों की शुभकामनाएं मिलीं, आपके आर्शीवचनों के लिए ह्रदय से आभार। अमर उजाला के कुछ पुराने साथियों को अपने ब्लाग पर देख कर बहुत खुशी हो रही है, मैं जल्दी ही लौट कर बातचीत का सिलसिला आगे बढानें की कोशिश करूंगी। फिलहाल इतना ही।

नवंबर 25, 2007

किस्सा-ए-इंतखाब भाग दो


अक्सर ऐसा होता था कि आप इंतखाब में तीन की चार या आठ की दस के बंटवारे वाली चाय पी रहे होते हैं कि गली के कोने से किसी की केवल गर्दन नुमाया हो कर पूछती है, जहूरदा रिहर्सल सीआरएसटी में है या नगरपालिका हाल में? जवाब मिलता है नहीं आज तल्लीताल स्कूल में होगी।
जी हां, ये नाटक के रिहर्सल की ही बात हो रही है। दरअसल इंतखाब एक कपङे की दुकान और बैठकी का एक अड्डा होने के अलावा नैनीताल के सबसे पुराने और सबसे सक्रिय थियेटर ग्रुप युगमंच का कार्यालय भी है। रिहर्सल के लिए जगह की मुश्किल या फंड के लिए किसी निश्चित स्रोत के अभाव और ऐसी ही तमाम दिक्कतों के बावजूद युगमंच में कुछ न कुछ होता रहता है और पूरे उत्साह के साथ होता है।

युगमंच का खासा वैभवपूर्ण इतिहास रहा है। यहां के कई सारे कलाकार नेशनल स्कूल आफ ड्रामा (एनएसडी) और इंडियन इंस्टिट्यूट आफ फिल्म टेक्नोलाजी (आईआईएफटी) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रशिक्षित हो कर अपने पंसदीदा कला क्षेत्रों फिल्म या थियेटर में काम कर रहे हैं। दिल्ली के थियेटर जगत के कई सारे बङे नाम जहूरदा और युगमंच से अच्छी तरह से परिचित हैं। गाहे-बगाहे कला, संस्कृति या साहित्य क्षेत्र की कोई हस्ती चाय सुङकते हुए इंतखाब में बैठी मिल जाए तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनके लिए भी इंतखाब उतना ही खास है जितना इंतखाब में उनका होना।

युगमंच की सांस्कृतिक गतिविधियों में केवल नाटक ही शामिल नहीं हैं। छोटी-मोटी काव्य गोष्ठियां तो आए दिन होती रहती हैं और उनमें हिस्सा लेने के लिए आपका बाकायदा कवि होना जरूरी भी नहीं। बस लगना चाहिए कि आप कवि बन चुके हैं और कविता सुनाना आपका मौलिक अधिकार है तो स्वागत है आपका मंच पर। बिल्कुल नौसिखिए भी वीरेन दा जैसे दिग्गज कवि के सामने बेझिझक कविता सुनाने के लिए स्वतंत्र हैं और कविता में थोङा सा भी सार है तो वीरेनदा की तारीफ भी सुनने को मिल सकती है। अवस्थी मास्साब कोई प्यारी सी टिप्पणी कर देंगे जिसे आप हमेशा याद रखेंगे। इससे ज्यादा और चाहिए भी क्या कच्ची रचनाओं वाले कच्ची उम्र के कवियों के आत्मविश्वास के लिए? कविता, कहानी, नाटक पढने-पढाने के इसी दौर में मिले उत्साहवर्धन से ही मेरे सहित हमारे कई साथियों को यह तय करने में मदद मिली कि हमें क्या करना अच्छा लगता और हमें आगे चल कर का करना चाहिए।

कुमाऊं की होली का अपना एक अलग रंग है। यहां होली एक-दो दिन का नहीं बल्कि महीने भर का गायकी का त्यौहार होता है। महिलाओं व पुरूषों की अलग-अलग होने वाली होलियों की गायन शैली में भी अलग होती हैं। पक्के रागों पर आधारित श्रृगांरिक गीतों वाली होली बैठकें रात-रात भर चलती हैं। होली के दिनों में युगमंच भी होलीमय होता है। होली की एक बैठक का आयोजन युगमंच के द्वारा किया जाता है जिसमें शहर के गणमान्य बुजुर्ग होल्यारों के साथ-साथ होली गाने वालों की नई पौध भी पूरे रंग में शामिल होती है। अबीर-गुलाल का टीका लगाने के बाद शुरू होता है आरोह-अवरोह के पेंचो-खम से भरा होली गायकी का दौर। उन होलियों की यादें अब तक कई बार ठंडी आहें भरने को मजबूर कर देती हैं।

हर साल होने वाला शरदोत्सव एक और मौका होता है युगमंच की हलचलें तेज होने का। मल्लीताल फ्लैट्स में हफ्ता दस दिन चलने वाले शरदोत्सव के रंगारंग कार्यक्रम में युगमंच की भी एक प्रविष्टि होती ही थी। कार्यक्रम शुरू होने से पहले तक की हङबङाहट, घबराहट और शो के बाद कई दिनों तक चलने वाला समीक्षाओं का दौर भी खासा दिलचस्प होता था।

केवल सांस्कृतिक ही नहीं बल्कि राजनीतिक गतिविधियां भी पूरे जोर-शोर से चलती रहती थी युगमंच में। उत्तराखंड राज्य की मांग का आंदोलन हो, विधानसभा चुनाव हों या कालेज में छात्र संघ के चुनाव का दौर हो, युगमंच की सक्रिय भागीदारी उसमें किसी न किसी रूप में होती ही थी। रात-रात भर बैठ कर पोस्टर बनाने और रात में ही उन्हें शहर की दीवारों पर चिपकाने का भी अपना सुरूर होता था। लगता था इंकलाब (वो जो भी होता हो) बस होने वाला है और उसे लाएंगे भी बस हमीं। उस समय लिखी अपनी कुछ कविताएं अब पढती हूं तो बहुत हंसी आती है।

अब सोचो तो अजीब सा लगता है कि कितना कुछ बदल गया हमारे आसपास। न वो पहले वाले बेफ्रिक दिन रहे, न ही बार-बार कुछ करने को उकसाने वाले लोग आसपास बचे हैं। कालेज के बाद कई साल तथाकथित कैरियर बनाने की दौङ में नैनीताल की गलियां तो छूटी ही, कितने आत्मीय दोस्तों के पते-ठिकाने भूले गए। बहरहाल इस ब्लागबाजी के बहाने उन भूले-बिसरे दिनों को याद करना भी एक तसस्लीजनक अहसास है।

नवंबर 22, 2007

औरतें

संभव है कि एक अकेली औरत
तनी रहती है पूरी सैनिक सत्ता के आगे
तमाम बंदिशों के बाद भी
जबकि सहम जाती हैं ज्यादातर लङकियां
गलत के आगे, एक हल्की डांट भर से

एक औरत नहीं झुकती कट्टरपंथियों के आगे
अत्याचार और विरोध के बावजूद
लिख देती है, वो सब जो लिखना चाहती है
जबकि बहुत सी लङकियां
पढना तक छोङ देती हैं
बङों की मर्जी के मुताबिक

जंग से बरबाद देशों में भी औरतें
बचा ही लेती हैं जिंदगी के टुकङे
और बनाती हैं घरौंदे जले मकानों में
जबकि चुनती हैं कुछ लङकियां
जल मरने का आसान रास्ता
जिंदगी से लङने की जगह

नवंबर 16, 2007

इंतखाब- एक दुकान

मल्लीताल बङा बाजार से अशोक सिनेमा हाल की ओर नीचे उतरती ढलवां सङक के दांई ओर मुङती संकरी गली के नुक्कङ पर मामाजी की चाय के दुकान के बाद वाली जो दुकान है वही है जहूर दा की दुकान इंतखाब। कौन जहूर दा? इंतखाब? अगर आप नैनीताल में रहते हैं या कभी रह चुके हैं और साहित्य, कला, लिखने- पढने से आपका दूर-दूर से भी संबंध रहा है तो यह मानना थोङा मुश्किल लगता है कि आप उनसे परिचित न हों। अगर आप कभी भी नैनीताल और उसकी सांस्कृतिक हलचलों से वाकिफ नहीं रहे तो माफ कीजिएगा आप इंतखाब नाम की दुकान और जहूर आलम नाम के इसके दुकानदार को नहीं जानते होंगे।

वैसे इंतखाब कपङे की दुकान है लेकिन हमेशा भरी रहने वाली उस दुकान में ग्राहकों के दर्शन मुश्किल से ही होते हैं। ग्राहक बेचारा करे भी तो क्या, एक तो दुकान इतनी छोटी सी, उस पर ना जाने कौन-कौन से लोग हमेशा वहां आ कर अड्डा जमाए रहते हैं। हमेशा ही बहस- बतकहियों की महफिल सी जमी रहती है, हिम्मत करके कोई दुकान में आ भी जाता है तो दुकान में बैठे और लोगों से ज्यादा खुद दुकानदार के चेहरे पर हल्की सी खीझ के भाव आ जाते है कि अरे यार ये क्यों आ गया अभी।

जहूर आलम को बहुत कम लोग ही उनके पूरे नाम से बुलाते होंगे, वो जहूरदा के नाम से ही जाने जाते हैं। पिछले १५ साल से, जब से मैं उन्हें जानती हूं हिना से रंगे लाल बालों और छोटी कद-काठी वाले जहूर दा के चेहरे पर समय के ब्रश का एक हल्का सा स्ट्रोक भी नहीं पङा है। उम्र जैसे साल दर साल बिना छुए आगे बढ जा रही है। हर बार उनसे मिलने पर उसी गर्माहट वाली कुछ-कुछ शर्मीली सी लगने वाली मुस्कराहट के साथ आपका स्वागत होता है। हर बीतते साल के बाद अजनबी से लगने वाले नैनीताल में यह स्वागत भरी मुस्कान तसल्ली देती है आपको घर वापसी का अहसास दिलाती है।

नैनीताल में रहने वाले या पढाई-नौकरी के दौरान कुछ अरसा बिता चुके लोग या कहूं कि थोङा संवेदनशील किस्म के लोग जानते हैं कि यह पहाङी शहर कुछ खास है। इसका अपना एक अलग सा मिज़ाज है जो मौसमों के साथ बदलने के बावजूद एक शाश्वत भाव के साथ आपकी आत्मा से चिपका रहता है। नैनीताल की हवाओं में एक उर्जा हमेशा चलायमान रहती है। एक छोटे शहर के शांत ठहराव के बावजूद नैनीताल में हमेशा कुछ न कुछ बजबजाता रहता है। इंतखाब यानी जहूर दा की दुकान भी नैनीताल के इस मूलभूत विशेषता को अपने में समाए हुए है।

दुकान बहुत छोटी सी है, मुख्य काउंटर के पीछे जहूर दा या असल में इंतखाब के कारोबार की जिम्मेदारी निभाने वाले देवेंद्र पांडे खङे रहते हैं या अपने पीछे वाली रैक की निचली संकरी पट्टी पर तशरीफ टिकाए बैठे होते हैं। जो लोग जहूर दा से परिचित है वह पांडे जी को भी जानते है। दुकान में होने वाली बौद्धिक व अबौद्धिक हर तरह की चर्चाओं के दौरान वह केवल मूकदर्शक बन कर नहीं बल्कि एक सक्रिय वक्ता की तरह हिस्सेदारी करते हैं।

इन दोनों के अलावा दुकान में चार लोग और बैठ सकते हैं, कपङों के डिब्बे इधर-उधर खिसका कर, लेकिन अक्सर सात-आठ लोग जैसे-तैसे अटक कर बैठे मिल ही जाते हैं वहां। दो-चार लोग तो दुकान की दो सीढियों में ही लटक कर काम चला लेते हैं। बीच-बीच में दुकान के सामने से गुजरते लोगों से ओहो पांडे जी, अहा गिरदा, अरे प्रमोद दा की पुकार के साथ कुशल-क्षेम का आदान-प्रदान जारी रहता है। दुकान के बाहर की संकरी सी गली जैसे एक फिल्मी परदे का काम करती है, जिसमें निर्मल वर्मा की कहानियों जैसे पात्र एक कोने से निकल कर दूसरे कोने में छिपते चले जाते हैं। दुकान के ठीक सामने यानी गिन कर तीन कदम की दूरी पर दिवाल से लगभग चिपकी हुई चूढी की दुकान हैं। इंतखाब में बैठ कर केवल इस दुकान में होने वाली हलचल पर नजर टिकाए भी घंटों बिताए जा सकते हैं।

बहरहाल यह तो था दुकान का भौतिक स्वरूप, खास बात है इसकी आत्मा। मेरे जैसे छोटे गांव-कस्बों से नैनीताल पढने आए कई सारे लोगों के लिए यह दुकान जैसे एक दूसरा विश्वविद्यालय थी। मैंने यहीं आ कर जाना कि थियेटर जैसी भी कोई चीज होती है, एक एनएसडी भी है कहीं, कोई कवि हैं वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल, नाज़िम हिकमत, कोई ग्यानरंजन हैं उनकी एक पत्रिका है पहल। यहीं जाना कि एक चीज़ होती है राजनीति और एक राजनीतिक विचारधारा। एक दक्षिण पंथ होता है और एक वामपंथ। एक जनमत भी है। यहीं आ कर पता चला कि फिल्म संगीत से इतर भी संगीत होता है। जैसे बंद कमरे में अनगिनत दरवाजे अचानक खुल गए हों।

ऐसा नहीं था कि सब बातें समझ में आ ही जाती थीं लेकिन जितना भी समझा उसने ही आगे के जीवन की दिशा तय करने में मदद करी ये क्या कम योगदान है एक दुकान का? मैं ही नहीं कुछ और लोग भी हैं जिनकी जिंदगी के रास्ते इंतखाब की रोशनी में तय हुए। जब मैं यह बात कर रही हूं तो इसमें अतिशयोक्ति कतई नहीं हैं। दरअसल इंतखाब बहुत ही सादामिज़ाज सी दुकान है कि वास्तव में इसे खुद भी यह अहसास नहीं होता कि अनजाने में ही यह कितने लोगों को कितनी बातें सिखा देती है। हिंदुस्तान की सांझा संस्कृति देखनी हो तो यहां आइए। जहूरदा की अगुआई में कुमाउंनी होली की रंगत देखनी हो या रामलीला में श्रवण कुमार नाटक का मंचन आप जान जाएंगे कि सांम्प्रदायिक सदभावना कहने-सुनने की नहीं गुनने की चीज़ है।

इंतखाब में आप बातें ही नहीं जानते बल्कि इतने सारे लोगों से, इतनी विधाओं के जानकार लोगों से मिलते हैं कि आप कितने ही आत्मकेंद्रित किस्म के हों आपके दोस्तों का दायरा बढना निश्चित है। कबाङखाने के ज्यादातर साथियों को मैं जहूर दा, युगमंच और इंतखाब के जरिए ही जानती हूं। कुछ साल पहले अवस्थी मास्साब से आप यहीं मिल सकते थे, हमेशा मुस्कराते लगते चेहरे पर मुंदी हुई आंखों के साथ शेक्सपियर के किसी नाटक के किसी हिस्से की दिलचस्प व्याख्या करते हुए। कंधे पर झोला टांगे गिर्दा भी यही मिल जाते हैं कभी-कभार। इंतखाब ही वह जगह हो सकती है जहां आपको असलम के लिखे नोहे का मतला ठीक करते जगमोहन जोशी यानी मंटूदा मिल सकते हैं, या जाङों के दिनों में अंडे का ठेला लगाने के कारण अनिल अंडा के नाम से मशहूर अनिल, जहूर दा से बहस करता दिख सकता है कि नाटक के काम में राजनीतिक विचारधारा का दखल नहीं होना चाहिए। प्रदीप पांडे किसी नए नाटक के संवादों से माथापच्ची करते यहीं मिल जाएंगे। संजीदा चेहरे के साथ अपनी हंसोङ टिप्पणियों से हंसा-हंसा कर लोट-पोट कर देने वाले हेंमत बिष्ट से या बच्चों वाली सरस मुस्कान वाले मामा जी यानी जितेंद्र् बिष्ट से भी यहीं मुलाकात हो सकती है। किस-किस का नाम लूं, इतने सारे आत्मीय और दिलचस्प लोगों से गुलजार रहती है इंतखाब की महफिल कि यहां से गए लोग सालों-साल यहां की यादों को सहेजे रखते हैं।

बीते सालों में इंतखाब भी काफी उथल-पुथल से हो कर गुज़रा है। कई सारे पुराने साथियों ने यह अड्डा छोङ कर नए मुकाम तलाश लिए। सालों से जुङे दिलों में जब दरारें आईं तो जाहिरी तौर पर तल्खियां भी सामने आईं। कई तरह के गिले-शिकवे हैं दिलों में, रिश्ते जितने गहरे होते हैं चोट भी उतनी ही गहरी होती है इसलिए आपसी कङवाहटें भी स्वाभाविक हैं। लेकिन समय की स्लेट पर सब कुछ अच्छा ही लिखा जाए यह संभव भी तो नहीं इसलिए कुछ अलगाव, कुछ दूरियां, कुछ कङवाहटों के लिए भी अपनी यादों में ही जगह बनानी होगी।