अक्तूबर 10, 2007

दिल्ली के शुरुआती बेरोजगारी वाले परेशान दिनों में लिखी गई दो कविताएं

विदाई

कभी नहीं सोचा था कि
नवाकुंरों से नवीन
भोर की स्वपनिल नींद से प्यारे
गंवई, अनगढ लेकिन सच्चे से शब्द
इतनी जल्दी विदा लेने लगेंगे मुझसे
कभी अनींदी रातों में यूँ ही कौंध कर
छुपने लगेंगे बस यूँ ही
और जब याद करूँगी उन्हें
तो याद आएंगे
आयोजित बैठकों में बोले जाने वाले प्रायोजित शब्द
कुछ लोग नहीं समझेंगे कि
जब बातें कही न जा रही हों
सिरफ बनाई जा रही हों
शब्दमित्रों का इस तरह रूठना
कितना खराब है।


उदासी
रात जाने के बाद
जब तक सुबह न हो
याद के पंछी डोलते हैं
पलकों पर होती है भीगी ओस
हंगामेदार उजाङ शहर में
भटकते दिनों की थकन
निंदियाती रातों के चुक जाने के बाद
छोङ देती है मुक्त
कंकरीटी शहर के बीच
दिखाई देते हैं पहाङ, बरफ
रीता मन भरा-भरा सा
कितने हँसते दिन छिपते आँखों में
होता है कोई घर, कोई बंधु
मन के अंसुआते कोनों में
आ जाता है यूं ही ऐसे ही
रात जाने के बाद सुबह होने तक के बीच

7 टिप्‍पणियां:

ANUNAAD ने कहा…

आयोजित बैठकों के प्रायोजित शब्द !
शब्दमित्र !
ऐसे पदों का इस्तेमाल करने वाली ये कवि कहां थी अब तक?

दीपा ये आपकी राह है इस पर कुछ यात्राएं आपको करनी ही होंगी।
उन कविताओं का इन्तजार रहेगा।

Ashok Pande ने कहा…

ये हुई ना बात दिपुली। मज्ज ऐ गो।

[ आशुतोष ] ने कहा…

फोकट के कुछ सुझाव:
1. हिसालूकाफल के बीच में डैश लगना चाहिए (हिसालू-काफल)। वरना काफल नहीं जानने वाले उसे हिसालू का फल पढ़ेंगे।
2. टेक्स्ट का साइज थोड़ा बढ़ाओ, ताकि पढ़ने में आसानी हो।
3. मास्ट के पीछे सोनापानी का एक सुंदर फोटो चेप दोगी तो मजा आ जाए।
4. `मेरे बारे में´ शीर्षक के नीचे का पाठ हिन्दी में रहता तो अच्छा था। अपने बारे में 1200 शब्दों में न सही 120 शब्दों में तो लिख ही मारो।
5. ब्लॉगर के सेटिंग में जाकर ब्लॉग को थोड़ा और सजाओ।

ANUNAAD ने कहा…

आशुतोष भाई की सलाह पर अमल करते हुए आपने अपने ब्लाग सुन्दर सजाया है

[ आशुतोष ] ने कहा…

जे हुई ना बात। अब थोड़ा कविता से बाहर आकर गद्य की ओर बढ़ो। इतनी सुंदर जगह जहां तुम रहती हो, जीवन को सुंदर बनाने वाली जानी कितनी चीजें बिखरी होंगी। दुनिया भर में अपनी जड़ों से कटे कबाड़ी इसे पढ़ कर तृप्त होंगे। वैसे तुम्हारा गद्य भी कविता जैसा ही होता है।

काकेश ने कहा…

किले हो हिसालु काफल मिके ली खाण छन.कां मिलाल.मेके ले सिखै दियो रे कविता करण.

http://kakesh.com

दीपा पाठक ने कहा…

हिसालु-काफल खाण लिजि तुमनकें पहाङ उण पङोल, कईं और नि मिलाल यो तुमनकें।