यूं ही हाथ पड जाती है पुरानी डायरी
किताबों के बीच दबी निरीह सी
कोने पर बैठी डांट खाई पालतू बिल्ली सी
सहसा उमडा लाड पुचकार कर पलटे पन्ने
यूं ही कुछ अनगढ बेतरतीबी सी सतरें
याद दिलाती धुंधली बातों की
कभी के बरसे आंसू बंद किन्हीं पन्नों पर
अब भी नरमा देते पलकों की कोरों को
कहीं पन्नों पर जंगली फूल दबे हैं
कच्ची हल्दी के फूल सफेद पडे हैं
छोटी प्यारी कोई कविता यहीं छिपी है किन्हीं कवि की
राहत देती सी यहां सभी हैं साथ तुम्हारे
फीस की एक रसीद भी यहीं मिलती है
अल्हड मस्ताने दिन रातों की यादों की कुंजी
सारी चीजें निकल बैठी हैं साथ में मेरे
बिछडे मित्रों सी गले लगा कर
पन्ने-पन्ने पलटे और फिर बंद हो गई
कच्ची उम्र के अनुभवों की संचित निधि
यूं ही साथ किताबों के बीच दबी डायरी में
अक्टूबर 15, 2007
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5 टिप्पणियां:
bahut achchii kavitaa hai.
किताबों के बीच दबी डायरी, किताब हो जाती है.
aapka dhanyavaad.
यह जो ' जैसा कुछ' है, वही ऊगता है पनपता है और बिखर जाता है ! जैसा चाहा वैसी महक !!
आपकी कविता का यह ख्याल ही झकझोरता है कि -
" बेटे की ऊंची नौकरी भी शायद
उनकी प्रार्थनाओं में नहीं होती
अगर पहले से महसूस कर पाते
घर में उनके न होने का दर्द। "
बेटे का कारपोरेट मोह और माँ की व्यथा !! अब इस ताजातरीन माहौल में तो इन दोनों का कोई पारावार नहीं | फिर भी माँ कामना करती है, प्रार्थना करती है वही कुछ जो बेटा चाहे | व्यथा, माँ होने की अनन्यतम नियति है | अनुभूतियों को अत्यंत मर्मस्पर्शी रूप में काव्य अनुवादित किया है | मन और मस्तिष्क का श्रेष्ठ समन्वय है | प्रतिभा को प्रणाम करता हूँ |
- RDS
आह .....वाह !!
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