अक्तूबर 15, 2007

सर्दियों की आहट


पहाङों में सर्दियों ने दस्तक दे दी है। दो दिन की छिटपुट बारिश ने मौसम का मिज़ाज बदल कर रख दिया गया है। हवा में ठंडी खुनक आने लगी है। यहां की सर्दियां मुझे बहुत अच्छी लगती हैं खास तौर पर सर्दियों की शामें जो अचानक बहुत उजली-उजली सी हो गई हैं। हवा में भारीपन के बावजूद सब कुछ बहुत खुला-खुला सा लगता है शायद पतझङ के कारण पत्तों से खाली हो रहे पेङों का इकहरापन शामों की उजास की वजह हो।

पहाङों में बदलते मौसम का अहसास शहरों की तरह केवल शरीर के स्तर पर नहीं होता। यह आंखों के सामने दिखाई भी देता है। दूर तक फैले विस्तार के कैनवास में प्रकृति रंगों के अपने खज़ाने को खुले हाथों से लुटाती है और हर मौसम को कलाकार की सी बारीकी के साथ बिल्कुल अलग रंग से सजाती है। रंगों के लिहाज से गर्मियां सबसे समृद्ध होती हैं, जंगल में आग की तरह दहकता बुरांश का सुर्ख लाल रंग, हिसालू-काफल-किलमोडा के चटख रंगों से सजी जंगली बेरियों की झाङियां और फूलों की असंख्य किस्मों से पहाङियां जैसे सजी रहती है। मानसून में प्रकृति का रंग कुछ और ही होता है। हरे रंग के जितने भी शेड्स आप कल्पना कर सकते हैं वो आपके सामने फैले होते है। खिङकी के अंदर घुसते बादलों के बीच हरे रंग की धरती को निहारना अपने आप में एक अनुभव है।

सर्दियां आते-आते प्रकृति के रंगों का चटकीलापन जैसे हल्का पङ जाता है। जैसे अल्हङता ने अपनी उन्मुक्तता से सहम कर खुद ही अपने कदम धीमे कर दिए हों। पत्ते हरे से बदल कर सुनहरे पीले हो कर धीरे-धीरे पेङों का दामन छोङ कर जमीन के आगोश में छुपने लगते हैं। सुनहरी होती घास पर गिरे भूरे-पीले पत्ते कभी-कभी एक अनजानी सी उदासी से भर देते हैं मन को। एक ऐसी उदासी जिसकी कोई वजह नहीं होती, जो लगता है कि जरूरी है दिनोंदिन व्यवहारिक होते जा रहे मन की संवेदनाओं को सहेजे रखने के लिए। ऐसी उदासी जिसमें आप कुछ रचना चाहते हैं। कम से कम मुझे ऐसा ही लगता है पहाङों में सर्दियों की उजासभरी शामों को गिरे हुए पत्तों के ऊपर चलते हुए।

आने वाले दिनों में लगातार भारी होती हवा में आवाजें तो क्या सन्नाटा भी साफ-साफ सुनाई देने लगेगा। सुबह ओस की बूंदें सर्द रातों के बोझ से जमी हुई घास को सफेद चादर से ढकने लगेंगी। चिङियों की चहचहाट सुबह के सन्नाटों को आवाजों से भर देंगी। गर्म चाय की तरावट जैसे अंतस तक पहुंचने लगेगी। तो ऐसी ही सर्दियों की आहट सुनाई देने लगी है यहां पहाङों में।

9 टिप्‍पणियां:

sidheshwer ने कहा…

सfर्दयों की आहट एक बढ़िया शब्द चित्र है । इसके साथ कई फोटो भी लगा दे तो अच्छा रहेगा । मैं अपनी एक गजल के दो शेर इस आलेख की तासीर को महसूस करते हुए अर्ज कर रहा हूं
सfर्दयां आ गईं सुस्ताइये
धूप को ओढ़िये बिछाइये ।

बर्फ के बेदाग सफे पर अपना
नाम लिखिये और भूल जाइये

[ आशुतोष ] ने कहा…

सिर्दयों की जाने कितनी खुशनुमा यादें बचपन से जुड़ी हैं। बेरीनाग में कभी-कभी जाड़ों की छुटि्टयों शुरू होने से पहले ही बर्फ पड़ जाती और हम सब बच्चे बर्फ के गोले को बहुत दूर से लुढ़का कर क्लासरूम तक लाते और बैठने वाली दरी के ऊपर बिखेर देते। दूर से लाने के कारण गोला बहुत बड़ा हो जाता था और समूची दरी गीली हो जाती। और फिर हमें छुट्टी मिल जाती।

सिर्दयों में बर्फीली हवाओं के थपेड़ों से बच्चों के गाल बांज के पेड़ की छाल जैसे हो जाते और मां रोज रात को सोते वक्त इन पर तेल या घी जैसा कुछ चुपड़ देतीं। दूसरे दिन हम फिर बर्फ से मुठभेड़ के लिए निकल पड़ते। नंगे हाथों से स्नोमैन बनाते और बाद में जब हथेलियां ठंड से अकड़कर दर्द करने लगतीं तो खूब रोते-कलपते।

जाड़ों में घुघती त्यार की प्रतीक्षा कितनी बेताबी से होती थी। मकर संक्रांति की पहली रात गुड़ की चाशनी मिला कर ढेर सारा आटा मढ़ लिया जाता और हम सब भाई-बहन मिल कर नाना प्रकार के घुघुत बनाते। मां इन्हें पकातीं और रात में ही इनकी मालाएं तैयार कर ली जातीं। मालाओं के बीच में छोटी-छोटी नारंगियां भी गूंथ ली जातीं। भाईसाहब सबके सो जाने के बाद अक्सर दूसरों की मालाओं से घुघते तोड़कर खा लेते और अगले दिन इस बात पर भी खूब कांव-कांव होती। सुबह-सुबह बच्चे उठ कर कव्वों को बुलाते और फिर एक दूसरे को अपने-अपने घुघुत खिलाते।

नैनीताल की सिर्दयों की अपनी अलग रूमानियत है। अब तो बर्फ गिरने की खबर लगते ही मैदानों से लोग पहुंच जाते हैं और नैनीताल की चढ़ाइयों में फिसल-फिसल कर अपने हाथ-पांव तुड़वाते हैं। एक जमाना था जब नैनीताल जाड़ों में सुनसान हो जाता था। माल रोड पर रात में `भूत-प्रेत´ घूमते और हम भी खाट से खरीदे ओवरकोट लादकर निरउद्देश्य मंडराया करते। ब्रुकहिल हॉस्टल के कमरे इन दिनों कितने ठंडे हो जाते थे! आज भी याद करो तो बदन में सिहरन होने लगती है। कभी इन कमरों में अंग्रेजी फौज के घोड़े रखे जाते थे। आजाद भारत में ऐसे विश्वविद्यालयों के छात्रों की हालत घोड़ों से भी गई-बीती यानी गधों जैसी है।

अरे, टिप्पणी करने के चक्कर में पूरी पोस्ट चेप दी। दीपा, तुमने छपछपी जो लगा दी थी!

हर्षवर्धन ने कहा…

मैंने देहरादून में करीब क साल बिताए हैं। एक बार रात में मसूरी में पड़ी बर्फ को दिन में धीरे-धीरे पिघलते देखा था। वो, अब भी रोमांचित कर जाता है। पहाड़ घूमने के लिए हिसालू काफल जाना अच्छा जरिया लगता है।

bhupen ने कहा…

aapne paharh ki yaad dila di. kitni-kitni adbhut images hai pahar mein. aur shanti bhi.

Mired Mirage ने कहा…

क्या समां बाँधा आपने ! एक बार मुझे भी लगा कि बस अब ठंड आती ही होगी । मन यहाँ से उड़ पहाड़ों की तरफ चला गया । आशुतोश जी से अनुरोध है कि वे अपनी टिप्पणी को एक अलग पोस्ट के रूप में प्रस्तुत करें ।
घुघूती बासूती

बोधिसत्व ने कहा…

पहाड़ की बड़ी मोहक याद बसी थी मन में आपने वहाँ कुरेद दिया....पर अच्छा लगा....लिखें और लिखें.....अच्छा है....बधाई

अजित ने कहा…

दीपाजी , बहुत सुंदर शब्दचित्र खींचा है आपने । पहाड़ पर सर्दियों की शुरुआती तस्वीर मन में उभरने लगती है। सुबह-दोपहर-शाम हर रंग को आपने सही शब्द और भाव दिए हैं। शुक्रिया...

दीपा पाठक ने कहा…

आप सभी लोगों की दिलचस्प और उत्साहवर्धक टिप्पणियों के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। सिद्धेश्वर जी और आशुदा आप की टिप्पणियों से तो लगा कि आती सर्दियों का शब्दचित्र उकेरने में कितनी रेखाएं और रंग तो मुझसे छूट ही गए। आप से अनुरोध है कि जब-तब समय निकाल कर मेरा लिखा जरूर पढें और उस पर बिल्कुल ईमानदारी से राय दें क्योंकि पिछले पांच सालों से मेरा लिखना बिल्कुल बंद है। ब्लाग के बहाने थोङा-बहुत लिखने की कोशिश कर रही हूं आप सभी लोगों का सहयोग बहुत जरूरी है। यहां बहुत सारे ऐसे लोग भी हैं जिनसे मेरा व्यक्तिगत परिचय नहीं है लेकिन वे मेरे ब्लाग पर आए और पढ कर टिप्पणी करने का समय निकाला, मैं केवल इतना कहना चाहती हूं कि मेरे लिए यह बहुत मायने रखता है। एक बार फिर से धन्यवाद।

khimuka ने कहा…

padh kar majaa aa gaya. pahaaro ki baithki holion ki yaad aa gayi. dilli jaise bare saharon main iski kami bahut akharti hai. aapne nainital ki sanskritik dharohar ko jis roop main shabdabadha kiya hai taareefe kabil hai. likhate rahiye vakai main kabadkhana kya hai isme moti chhipe huye hain. hamlog lucknow main 80 ke dauraan natak karate thai usmai khimuka ke naam se main prasidha ho gaya tha. kagar ki aaag naam ka yeh naatak kumaoni main naveen joshi ne likha thaa uski yadein bhii taja ho gayee. dhanyavad.