सितंबर 29, 2010

घर की बातें!!

पिछले कुछ समय से मुझे 'बच्चों की परवरिश कैसे की जाए' इस विषय पर किताबें उपहार में मिलने लगी हैं, कुछ लोग किसी वेबसाइट का पता बताते हैं तो कोई कुछ और। सोशल नेटवर्किंग साइट पर भी यह मुद्दा खासा चर्चा में रहता है। खासतौर पर लड़कियों को कैसे पाला जाए कि वह बिगड़े नहीं, इस बारे में मेरी पिछले दिनों कई मांओं के साथ बातचीत हुई और अधिकांश मामलों में बच्चों को ले कर मां-बाप काफी हद तक परेशान थे। इन सब के बीच मैं यह सोच रही हूं कि जब हम भाई-बहन बड़े हो रहे थे तो अम्मा-पापा की भी तो इन्ही परेशानियों से दो-चार होना पड़ा होगा। और मुझे याद आए दो-चार ऐसे वाकये जो मेरी सीधी-साधी, कम पढ़ी-लिखी लेकिन बहुत ही व्यवहार-कुशल मां और रोबदार से दिखते लेकिन बहुत नरमदिल मेरे पापा की ज़बरदस्त 'parenting skills" को दिखाते हैं।

मुझे हमेशा यह सोच कर हैरत होती है कि आजकल तमाम सुख-सुविधाओं के बीच एक या दो बच्चों को पालने में दिक्कत होती है तब अम्मा के लिए हम पांचों को पाल पाना कितना मुश्किल रहा होगा। जब रसोई में गैस जैसी साधारण सुविधा भी नहीं थी।
बहरहाल, बात हो रही थी उनकी ‘parenting skills’ की तो सबसे पहली बात मुझे जो याद आ रही है वो मेरी किताबें पढ़ने की आदत की है। हां, पढ़ने का चस्का लगाने के पीछे भी मेरे पापा का ही हाथ था। हम तब देहरादून में रहते थे और मैं मुश्किल से पहली या दूसरी कक्षा में पढ़ती थी। तभी से पापा मेरे लिए नंदन, चंपक और चंदामामा किताबें लाते थे। पापा की तनखा मामूली सी थी हालांकि वह बहुत कमाऊ विभाग में थे लेकिन उनके बहुत ही धर्मभीरू किस्म के होने के चलते हमारी आर्थिक दशा में उससे कभी कोई फर्क नहीं पड़ा। सो बंधी-बंधाई तनखा, किराए का मकान, घर में लगे रहने वाली रिश्तेदारों की भीड़ के बावजूद किताबों के लिए खर्च करने में उन्होंने कभी कोई कोताही नहीं की। साथ ही धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान भी लगा हुआ था। नया-नया पढ़ना सीखने के कारण मेरे हाथ जो लगता था उसे ही पढ़ने की कोशिश करती थी। फिर एक दिन एक रिश्तेदार के घर रखी किताबें टटोलते हुए सबसे पहले एक घटिया चलताऊ किस्म का उपन्यास पढ़ा और फिर जैसे उस तरह की किताबें पढ़ने का चस्का लग गया। तब मैं केवल तीसरी या चौथी कक्षा में थी।

तब उपन्यास पढ़ना गंदी बात समझी जाती थी ज़ाहिरी तौर पर जिस तरह के उपन्यास मैं पढ़ने लगी थी वह घटिया थे, विशेषकर उस उम्र के लिए। यह बात मुझे भी पता थी इसलिए ये उपन्यास सबसे छुप कर पढ़े जाते थे। एक दिन अम्मा ने पाया कि मैं जून की झुलसती गर्मीं में छत की सीढ़ियों में छिप कर उपन्यास पढ़ रही हूं। अम्मा ने किताब की बाबत एक शब्द भी नहीं कहा जबकि यूं रंगे-हाथों पकड़े जाने से मेरी जान सूख गई थी। उसी शाम पापा ने मुझे बुला कर पूछा कि मैं क्या पढ़ रही हूं और कहां से लाई वगैरह-वगैरह। आमतौर पर डांट-डपट करने वाले पापा ने यह सब बहुत शांति से पूछा था और कहा कि ये किताबें तुम्हारे लायक नहीं है, इन्हें मत पढ़ा करो। कुछ दिनों बाद ही पापा मेरे लिए एक उपन्यास लाए शिवानी की लिखी भैरवी मुझे वह पढ़ कर बहुत मज़ा आया क्योंकि पता नहीं क्यों बच्चों की कहानियां मुझे बहुत बचकानी लगती थीं, जब मैं बच्ची थी तब भी। इसलिए मेरे लिए यह किताब चुनना पापा की समझदारी ही दिखाता है। उसके बाद नियमित अंतराल के बाद मुझे साहित्यिक उपन्यास, रादुका से प्रकाशित रूसी साहित्य की किताबें मिलती रहीं और बाज़ारू किस्म के उपन्यासों से मेरा मन कब उचाट हुआ मुझे पता ही नहीं चला।


अभी मैं इस पूरी स्थिति का आंकलन करती हूं तो मैं आश्चर्य करती हूं कि कितनी सहजता से मुझे अहसास कराए बिना मेरी पढ़ने की आदत को एक सही दिशा दिखा थी। वो भी तब जबकि साहित्य वगैरह के बारे में उनका रुझान ज़्यादा नहीं था। जितना मैं खुद को जानती हूं मुझे पूरा यकींन है कि अगर तब मुझे डांट कर मना किया जाता तो मैं और भी घटिया किताबों को पढ़ने के लिए चुन कर उनके खिलाफ अपना विद्रोह ज़ाहिर कर सकती थी।


हम तीन बहनें थी, एक खास उम्र के बाद यह बात मोहल्ले वालों की नज़रों को और चौकस बना देती है और गली-मोहल्ले के शोहदों को और सक्रिय। हम लोग छोटे शहरों की अच्छी लड़कियों के लिए निर्धारित सभी नियमों का पूरी तरह से पालन करती थीं। हमेशा सिर झुका कर चलना, शोहदों के फिकरों को सुन कर भी अनसुनी कर निकल जाना और कुछ भी हो जाए सार्वजनिक जगहों पर लड़कों से बातें न करना। ऐसा किसी ने हमें कहा नहीं था लेकिन पता नहीं कैसे ये कायदे-कानून हर बड़ी हो रही लड़की को पता होते थे, क्योंकि बिगड़ी लड़की का तमगा मिलना बहुत ही आसान होता था जिससे सब डरती थीं। मैं इतना ज़्यादा डरी रहती थी कि कभी किसी से बात करनी पड़ जाए तो मैं डर से हकलाने लगती थी और चेहरे की सारी नसें तन जाती थी। यह एक तरह का फोबिया था। ऐसे हालातों में घर के अंदर रहना ही सबसे अच्छा विकल्प होता था, असर यह हुआ कि मैं तो पूरी तरह घरघुस्सु हो गई थी। मुहल्ले में एक-दो सहेलियों को छोड़ कर और किसी के घर जाने की कभी हिम्मत ही नहीं होती थी।
हमारे पड़ोस में एक परिवार रहता था जिसमें मुझसे कुछ बड़ी उम्र के तीन भाई थे ज़ाहिरी तौर पर इसलिए उस घर में जाने का तो सवाल ही नहीं था। एक बार दीवाली में उनके किसी करीबी रिश्तेदार की मौत होने के चलते त्यौहार नहीं मनाया जा रहा था। चूंकि उन दिनों मोहल्ले के रिश्ते काफी करीबी हुआ करते थे तो अम्मा ने उनके लिए भी गुझिया बना डाली ताकि बेचारे बच्चे तो त्यौहार के दिन मिठाई से वंचित न रहें। गुझिया पहुंचाने की जिम्मेदारी मुझे दी गई, क्योंकि अंम्मा और पापा ही लड़कों को ले कर मेरे अंदर बैठे इस डर से पूरी तरह से नावाकिफ थे तो उन्हें बहुत गुस्सा आया जब मैंने कहा कि मैं नहीं जाउंगी वहां। पापा ने कहा कि ये तो तुम्हें ही दे कर आने होंगे। अब एक तरफ वो फोबिया था दूसरी तरफ पापा से डांट खाने का डर। मैं किसी तरह घसीटते हुए बिल्कुल अपने घर से जुड़े उनके घर के गेट तक तो पहुंच गई लेकिन उन्हें आवाज़ देने या गेट खटखटाने की हिम्मत ही नहीं हुई। हाथ-पैर जैसे जम से गए थे, मैं वापस आ गई और रोने लगी। पापा ने पूछा क्या बात है? मैंने कहा कि मुझे वहां जाने में डर लग रहा है। और पता नहीं पापा क्या और कैसे समझे उन्होंने मुझसे कहा कि, “बेटा ऐसे डर के ज़िंदगी थोड़ी चलेगी। जा कर दे कर आओ।"


हालांकि उन्होंने इसके अलावा कुछ भी नहीं कहा लेकिन पता नहीं मुझे इतनी हिम्मत कैसे आई। मैं सीधे गई, गेट पर आंटी को आवाज़ लगाई जिसे सुन कर उनका बेटा बाहर आया और मैंने उसे मिठाई पकड़ा दी। वो लड़का स्कूल में मुझसे एक क्लास आगे था। उन्हीं दिनों तिमाही या छमाहीं परीक्षा के परिणाम निकले थे। वो लड़का अपनी क्लास में और मैं अपनी क्लास में प्रथम आए थे। जब मैंने उसे मिठाई दी तो उसने बहुत ही सहजता से पूछा, "तेरे गणित में कितने नंबर हैं?" मैंने बिना हकलाए या झेंपे उसे अपने नंबर बताए और फिर हमने थोड़ी देर ऐसी ही कुछ और बातें की और मैं वापस आ गई। "चमत्कार!! इतना आसान था इस फोबिया से बाहर निकलना…!!"


मैं सोच कर हैरान रह जाती हूं कि पापा ने कभी पेरेंटिंग पर या वैसे भी कोई बहुत ज़्यादा किताबें नहीं पढ़ी उसके बावजूद वो कितनी अच्छी तरह समझ गए मेरी परेशानी और उसका उपाय। आज मैं सबसे बहुत खुल कर बातचीत कर लेती हूं, अपरिचितों के साथ आसानी से दोस्ती कर लेती हूं तो इसका श्रेय निसंदेह मेरे पापा की parenting skills को जाता है।


हमारे कस्बे में नए-नए खुले डिग्री कॉलेज में क्योंकि विज्ञान की कक्षाएं नहीं थीं इसलिए बारहवीं के बाद पढ़ने के लिए नैनीताल गई। मेरे कुछ रिश्तेदारों ने इस फैसले का बहुत विरोध किया कि पांच बच्चों का खर्च उठाना है, वैसे भी दो-चार साल बाद लड़की को शादी करके विदा करो...हॉस्टल में डाल कर क्यों पैसे खर्च करते हो। पापा आर्थिक से ज़्यादा इस बात को सोच कर मेरे नैनीताल जाने के पक्ष में नहीं थे कि वो मेरे बिना कैसे रहेंगे। लेकिन इस बार झंडा मेरी मां ने उठा लिया था कि मेरी लड़की पढ़ने के लिए नैनीताल ही जाएगी किसी रिश्तेदार के घर पर रह कर नहीं पढ़ेगी। दरअसल मेरी मां को उनके सख्तमिजाज़ दादा जी की वजह से ही बहुत जल्दी ही स्कूल छोड़ कर घर के कामकाज में लग जाना पड़ा था इसलिए पढ़ने की साध वह अपनी लड़कियों के जरिए पूरा करना चाहती थी।

इस तरह आगे की पढ़ाई के लिए पांच साल नैनीताल रहना हुआ जहां बहुत सारे दोस्त बने, खासतौर पर युगमंच के साथ सक्रियता के दिनों में। छुट्टियों में दोस्तों की चिट्ठियां आती थी जिसमें कभी-कभार किसी लड़के की भी होती थी। जिनके बारे में बिना किसी हिचक के अम्मा-पापा को बताती थी। स्कूल के दिनों में जहां मेरी क्लास की दूसरी लड़कियों को स्काउट-गाइड के कैंप वगैरह में जाने के लिए घर में मिन्नतें करनी पड़ती थीं। हमारे घर में इसके लिए कभी रोक-टोक नहीं हुई, बल्कि हर कैंप में जाने, वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। हमारे घर में दोस्तों का निस्संकोच आना-जाना होता था जिसके बारे में मेरे घर वालों को कोई परेशानी नहीं होती थी लेकिन कुछ पड़ोसियों के माथे पर बल पड़ते थे। शायद एक दिन अम्मा ने कहीं कुछ सुन लिया तो वह कुछ परेशान थी और उन्होंने इस बाबत कुछ चिंता ज़ाहिर की थी लेकिन पापा ने एक टूक कहा कि, “मैं चाहता हूं कि मेरे बच्चे बिना किसी कुंठा के रहें, अगर किसी को इससे किसी को दिक्कत है तो हम क्या कर सकते हैं। " मैं उनकी बात अब तक नहीं भूली।


मैं जानती हूं कि मेरे पापा विचारों के मामले में बहुत आधुनिक नहीं हैं लेकिन उस समय उनकी यह बात सुन कर मुझे गर्व हुआ और मैंने हमेशा कोशिश की कि मेरे किसी भी काम से पापा के इस विश्वास को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए। जब मैंने एक अलग धर्म के लड़के से शादी करने का फैसला किया तब भी पापा को मेरे चुनाव पर तो भरोसा था लेकिन शुरुआत में उनकी बहुत ही हल्की सी आनाकानी के पीछे वजह वजह थी कि उन्हें यही नहीं पता था कि लड़का कुछ कमाता-धमाता भी है या नहीं। एक पिता के तौर पर उनकी चिंता बहुत स्वाभाविक थी लेकिन एक बहुत ही संकीर्ण विचारधारा वाले और बहुत कम दुनिया देखे हमारे संयुक्त परिवार के दबाव के बावजूद अम्मा-पापा ने जिस सहजता से मेरे फैसले का समर्थन किया वह अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम था उनके स्तर पर। इसके लिए मैं हमेशा उनकी आभारी रहूंगी।


एक किस्सा और याद आ रहा है वह दिल्ली के दिनों का है। नैनीताल में युगमंच के दौरान दोस्तों के साथ बेबाक हंसी-मज़ाक की आदत पड़ी होने के चलते मैं हर किसी के साथ बहुत सहजता से बात कर लेती थी। लेकिन हिंदी अखबारों का माहौल थियेटर से बहुत अलग होता है, यह बात मुझे तब समझ आई जब कई सारे दोस्तों ने मेरी हंसी-मज़ाक के कुछ और ही मतलब निकालने शुरू कर दिये। खैर, एक महाशय थे जिन्हें मैं बहुत ही परिपक्व और बहुत खुले दिमाग वाला दोस्त समझती थी। तो एक छुट्टी में मैं जब अपने घर आई थी तो उन महाशय ने कहीं से मेरे घर का फोन नंबर पता कर लिया और एक दिन उनका फोन आ गया। मुझे इस बात पर इतना गुस्सा आया कि उधर से कही जा रही बात सुने बिना मैंने जो जी में आया डांटने के बाद फोन रख दिया। यह सब अम्मा-पापा के सामने हुआ। दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला। अगले दिन अम्मा ने कहा, "तूने उसकी बात तो सुनी ही नहीं, बिना सुने इस तरह किसी को इस तरह उल्टा-सीधा बोलना अच्छी बात नहीं है।" मैंने कहा, “तुझे कुछ पता नहीं अम्मा, लोग कैसे-कैसे होते हैं।" अम्मा ने कहा, "हो सकता है कि तू उसे मुझसे अच्छी तरह जानती है, लेकिन अगर उसकी बात सुन लेती तो शायद तू उसे और अच्छी तरह से जान जाती चाहे उसकी बुराई ही सही! कभी भी किसी का अपमान नहीं करना चाहिए, ऐसे में तो कोई भी तेरा दुश्मन बन जाएगा। तुझे उससे बात नहीं करनी थी उसे सीधे शब्दों में कहती तो वह समझ भी जाता और उसे बुरा भी नहीं लगता। किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिए!"

सच कहूं तो मैं हतप्रभ रह गई थी अम्मा की वह बात सुन कर। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरी कम पढ़ी-लिखी मां दुनियादारी के साथ मानव मन की बातों को इतनी अच्छी तरह से समझती है। सामान्य तौर पर उसे खुश होना चाहिए कि मैंने किसी लड़के को उसकी "गलत हरकत" के लिए इस तरह से डांटा, लेकिन उसने मेरी खामी को देखा और समझाया। बाद में इस तरह की परिस्थितियों से निपटने के लिए मैं अम्मा का सुझाया रास्ता ही अपनाती थी, जिसका परिणाम यह हुआ कि इस तरह की पहल करने वाले कुछ दोस्तों के साथ बिना कोई कड़वाहट के बाद में भी अच्छी बोलचाल वाले रिश्ते बने रहे। क्या कहूं इसे? कुछ और या अम्मा की parenting skills!! :-)

ऐसा नहीं है कि अम्मा-पापा बिल्कुल आदर्श अभिभावक थे। हो सकता है कि उनकी जिन बातों से मुझे नई समझ मिली, उन्हें बिना उसके मनोवैज्ञानिक परिणामों के बारे में जाने बिना बस अपनी सहज बुद्धि के आधार पर कहा गया हो। कई बातों को ले कर मेरी उनसे लड़ाइयां होती थी। पापा से अब तक होती हैं, लेकिन बहुत सारे मामलों में वो अपने समय से आगे के साबित हुए हैं खास कर हमारी जैसी सामाजिक-पारिवारिक परिस्थितियों में और उसके लिए मुझे उन पर बहुत गर्व है। हम सभी भाई-बहनों ने बहुत ही सहज, खुशनुमा बचपन बिताया और सब आत्मनिर्भर और अपनी स्वतंत्र सोच वाले हैं तो इसके पीछे अम्मा-पापा की कर्मठ और जिम्मेदार अभिभावक की भूमिका का भी हाथ है। हम सब भाई-बहनों के पास ऐसे ही कोई न कोई किस्से हैं जिन्हें अब, जब हम खुद मां-बाप बन चुके हैं, बहुत शिद्दत से याद करते हैं।

8 टिप्‍पणियां:

आशीष ने कहा…

Very well written. I can definitely vouch for the fact that you too definitely know a thing or two about parenting !!

दीपा पाठक ने कहा…

Ha..ha.ha..thanks for words of approval.

ANIL YADAV ने कहा…

Whoever said it first spoke with insight and wisdom: you don't own children, you only borrow them.- Anne Linn

mountainlad ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
mountainlad ने कहा…

प्रवासी विरह में गूगल के चलते आपके ब्लॉग तक आ पहुंचा. "रिमझिम बारिश के बीच पहाङी खाना" पढ़कर बरसात के गाबे और जाड़ों के पिनालू अनायास जुबां पर महसूस किये. "घर की बातें!!" पढ़कर कुछ धुंधला बचपन याद आया, और शायद काफी समय के बाद मासूमियत से मुस्कुराया. सरल भाषा और अनुभवों के सहज प्रवाह ने प्रभावित किया. साधुवाद. बीच बीच में आपका ब्लॉग टटोलता रहूँगा.

लम्बे अरसे के बाद हिंदी लिख रहा हूँ. त्रुटियाँ नज़रंदाज़ करें.

दीपा पाठक ने कहा…

धन्यवाद बंधु (mountainlad)! ब्लॉग पढ़ने के लिए और उस पर प्रतिक्रिया देने के लिए समय निकालने के लिए धन्यवाद। जहां तक हिंदी की बात है तो जितना मुझे आती है उसके मुताबिक यह बहुत अच्छी है।
अनिल जी बहुत सही बात कही है लेकिन दिल मानता कहां है, बच्चे होते ही अपनी जायदाद लगने लगते हैं।

vijay mehta ने कहा…

दीपाजी,
न जाने किसी मित्र ने आपके ब्लॉग का url मुझे दिया और क्लिक करने के बाद "घर की बातें" पढ़ी ,, बहुत अच्छा लगा.. क्यूंकि पढ़ते पढ़ते कहीं कहीं कहानी को मैं मुझसे जोड़कर अतीत में पहुँच रहा था... वास्तव में मेरी बिटिया भी पढ़ी लिखी है आजकल वो बंगलौर में सॉफ्टवेर इंजिनियर के पद पर एक अच्छी कंपनी में कार्यरत है.... वो अपने पढाई के दिनों में उसी तरह से पेश आती थी जैसे आप अपने पापा से ... चूंकि मुद्दों पर हम दोनों ने काफी बहस की है इसलिए आपके वृतांत में अपना अतीत याद आ गया ......बहुत अच्छा लिखा .....विजय मेहता

Unknown ने कहा…

Hi Deepa..shayad mujhe tau tu jaanati hee hogi...I m seema bora yr ex roommate and classmate....well jokes apart...."ghar kee baatain" ka article pada...mazaa aa gaya and to be very honest although I was reading it for the first time but aisa laga kee yae sab baatein tau mae pahlae sae jaanati hoon...shayad hostel days mae hum log kaafi baatein share kar chukae hain...best wishes